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Deshaj Times Special: शिव जटाओं की ‘भागीरथी’, वट-सिंदूरी से अलंकृत सत्य-सावित्री

आज जब महानगरों में रिश्तों की मियाद कागज़ के चंद टुकड़ों पर तय होने लगी है और नदियां महज़ गंदे नालों की 'तस्वीर' बनकर रह गई हैं, तब भी हमारा देहात अपनी आदिम आस्था को सीने से लगाए खड़ा है। ज्येष्ठ की इस तपती अमावस्या को जब कोई सुहागिन लाल-पीली साड़ी में सजकर, माथे पर सिंदूर का 'ग़ाज़ा' (सुर्खी) सजाए बड़ के पेड़ के चक्कर काटती है, तो वह सिर्फ़ एक रस्म नहीं निभा रही होती। वह यमराज की ज़िद के आगे सावित्री के उस 'इस्तिक़ामत' (दृढ़ता) को दोहरा रही होती है, जो मौत को भी ज़िंदगी लौटाने पर मजबूर कर दे...

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ह कहानी सिर्फ़ एक व्रत की नहीं, बल्कि आस्था के उस ‘चराग़’ की है जिसे वट वृक्ष की जटाओं, शिव की स्थिरता और गंगा की अविरलता ने सदियों से तूफानों के बीच भी जलाए रखा है। बरगद को पूजने की वजह सिर्फ़ अंधभक्ति नहीं, बल्कि उसका ‘अक्षय’ होना है—वह वजूद जो प्रलय में भी न ढहे। आइए, आधुनिकता की चकाचौंध से दूर, आस्था के उस ‘आस्ताने’ (चौखट) पर चलते हैं जहां एक औरत की तपस्या के दम पर आज भी हमारे समाज का ‘एतबार’ और संस्कृति ज़िंदा है…

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Deshaj Times Special: The 'Bhagirathi' Flowing from Shiva's Locks—Satyavan and Savitri, Adorned with Banyan and Vermilion.
Deshaj Times Special: The ‘Bhagirathi’ Flowing from Shiva’s Locks—Satyavan and Savitri, Adorned with Banyan and Vermilion.

गंगा-शिव और सावित्री के बड़ के तले…गंगा, शिव और सावित्री के वट वृक्ष के तले…हे गंगा मैया, तू तो शिव की जटाओं से अवतरित हुई है। जिसकी एक बूंद से सहस्रों पाप कट जाते हैं, वही तू आज नालों में बह रही है। पर हम ग्रामीण जन आज भी तेरा नाम लेकर मस्तक झुकाते हैं।

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देखो, आज वट सावित्री का पावन पर्व है।

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गांव की बहू-बेटियां प्रातःकाल से ही वट वृक्ष के नीचे एकत्रित हैं।

लाल-पीली साड़ियों में सजी, माथे पर सिंदूर की लाली, हाथों में रेशमी धागा,

और अधरों पर बस एक ही प्रार्थना —

‘हे वट बाबा, मेरे सुहाग को चिर आयु प्रदान करना।’

Deshaj Times Special: The 'Bhagirathi' Flowing from Shiva's Locks—Satyavan and Savitri, Adorned with Banyan and Vermilion.
Deshaj Times Special: The ‘Bhagirathi’ Flowing from Shiva’s Locks—Satyavan and Savitri, Adorned with Banyan and Vermilion.

सावित्री ने तो यमराज से भी अपना सुहाग छीन लाई थी।

वह देह से नहीं, मन से तपस्विनी थी।

आज भी गांव की नारियां उसी पथ पर चल रही हैं।

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तीखी धूप में खड़ी रहेंगी, पांवों में छाले पड़ जाएं, पर व्रत का संकल्प नहीं तोड़ेंगी।

और वह वट वृक्ष

उतना ही प्राचीन, उतना ही अविचल, जैसे शिव की जटाएं।

जैसे गंगा की अविरल धारा।

जड़ें धरती में गहरी धंसी, डालियां आकाश को छूती,

और पत्ते-पत्ते पर गांव की मन्नतें बंधी हुई हैं।

समझो भैया…

गंगा जल है तो जीवन है,

शिव की जटा है तो स्थिरता है,

और सावित्री का व्रत है तो सुहाग की मर्यादा है।

आज जब नगरवासी नदी को नाली बना रहे हैं,

और रिश्तों को कागज़ का बंधन समझ रहे हैं,

तब भी गांव में एक नारी वट के नीचे बैठी कह रही है —

“हे गंगा मैया, हे भोलेनाथ, हे सावित्री मां…

मेरे घर में बस प्रेम बना रहे, मेरे सुहाग की छाया सदैव बनी रहे।”

Deshaj Times Special: The 'Bhagirathi' Flowing from Shiva's Locks—Satyavan and Savitri, Adorned with Banyan and Vermilion.
Deshaj Times Special: The ‘Bhagirathi’ Flowing from Shiva’s Locks—Satyavan and Savitri, Adorned with Banyan and Vermilion.

बस इतने में ही गांव टिका हुआ है।

नदी भी बहती रहे, शिव भी ध्यानस्थ रहें,

और नारी का विश्वास भी अटल बना रहे।

वट सावित्री व्रत: कथा, कर्म और विश्वास

Deshaj Times Special: The 'Bhagirathi' Flowing from Shiva's Locks—Satyavan and Savitri, Adorned with Banyan and Vermilion.
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  • कब मनाया जाता है

    हर साल ज्येष्ठ महीने की अमावस्या तिथि को वट सावित्री व्रत रखा जाता है।

  • कब से मनाया जाता है

    पौराणिक कथा के अनुसार, जब माता सावित्री ने अपने पति सत्यवान को यमराज से वापस लाया था, तभी से सुहागिन महिलाएं इस व्रत को रखने लगीं। ज्येष्ठ अमावस्या के दिन वट वृक्ष के नीचे ही सावित्री ने सत्यवान के प्राण वापस पाए थे, इसलिए इस दिन वट वृक्ष की पूजा का विधान है। इसे अखंड सौभाग्य और पति की लंबी उम्र के लिए रखा जाने वाला प्रमुख व्रत माना जाता है।

  • कैसे मनाया जाता है

    सुहागिन महिलाएं निर्जला व्रत रखती हैं। भोर में नहाकर लाल-पीली साड़ी पहनती हैं। बड़ के पेड़ की जड़ में जल चढ़ाती हैं, कच्चा सूत लपेटकर 14 या 108 बार परिक्रमा करती हैं। गेहूं, चना और मिठाई चढ़ाकर सावित्री-सत्यवान की कथा सुनती हैं। शाम को व्रत पारण करती हैं।

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पूजा उसी की होती है जो ‘अक्षय’ हो

Deshaj Times Special: The 'Bhagirathi' Flowing from Shiva's Locks—Satyavan and Savitri, Adorned with Banyan and Vermilion.
Deshaj Times Special: The ‘Bhagirathi’ Flowing from Shiva’s Locks—Satyavan and Savitri, Adorned with Banyan and Vermilion.

गांव में आम, कटहल, नीम सब हैं। पर पूजा हमेशा बरगद की ही क्यों? वजह सिर्फ परंपरा नहीं, तर्क भी है।

1. धार्मिक और पौराणिक वजह

  • अक्षयवट: बरगद को “अक्षय वट” कहा जाता है – कभी न खत्म होने वाला पेड़। मान्यता है कि प्रलय के बाद भी ये बचा रहता है। कृष्ण ने ब्रज में इसी के नीचे कालिया नाग को मारा था। प्रयागराज का अक्षयवट सबसे मशहूर है।

  • त्रिदेव का वास: मान्यता है कि बरगद की जड़ में ब्रह्मा, तने में विष्णु और शाखाओं में शिव रहते हैं। इसलिए इसकी पूजा से तीनों देवता प्रसन्न होते हैं।

  • सावित्री-सत्यवान की कथा: बरगद के नीचे ही सावित्री ने यमराज से अपने पति सत्यवान के प्राण वापस लिए थे। इसलिए सुहागिनें वट सावित्री पर इसी की पूजा करती हैं।

आम और कटहल की ऐसी कोई केंद्रीय पौराणिक कथा नहीं है जो पूरे भारत में पूजा का आधार बने।

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2. व्यावहारिक वजह

  • उम्र और छाया: बरगद सैकड़ों साल जीता है और फैलकर बहुत बड़ी छाया देता है। पुराने समय में गांव की पंचायत, अदालत, मेला सब इसी के नीचे लगते थे। लोग कहते थे “न्याय बरगद के नीचे होता है”

  • आम-कटहल: ये फल के पेड़ हैं। 30-50 साल में कमजोर हो जाते हैं, फल तोड़ने से टहनियां टूटती हैं। पूजा के लिए “स्थायी” और “अक्षय” चीज चाहिए होती है।

3. प्रतीकात्मक वजह

  • बरगद = अटलता, परिवार: इसकी जटाएं जमीन में जाकर नए तने बनाती हैं। एक पेड़ पूरा जंगल बन जाता है। इसलिए ये परिवार, वंश परंपरा और अटलता का प्रतीक बना।

  • आम-कटहल = भोग: ये भोग और फल के प्रतीक हैं। देवता को फल चढ़ता है, पर पेड़ खुद देवता नहीं बनता।

संक्षेप में कहना ज्यादा मुनासिब होगा, आम-कटहल खाने के लिए हैं, बरगद टिकने के लिए। पूजा उसी की होती है जो “अक्षय” हो।

Deshaj Times Special: The 'Bhagirathi' Flowing from Shiva's Locks—Satyavan and Savitri, Adorned with Banyan and Vermilion.
Deshaj Times Special: The ‘Bhagirathi’ Flowing from Shiva’s Locks—Satyavan and Savitri, Adorned with Banyan and Vermilion.

आज भी जब शहर रिश्तों को कागज़ और नदियों को नाली समझ रहा है, तब गांव में एक औरत बड़ के तले बैठी यही दोहरा रही है – “हे गंगा मैया, हे भोलेनाथ, हे सावित्री माई… मेरे घर में प्रेम रहे, मेरे सुहाग की छांव बनी रहे।”

यही भरोसा है जो गांव को, गंगा को, शिव को और सुहाग को जोड़े हुए है।

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