
Rajgir Malmas Mela: राजगीर में एक महीने तक चलने वाला पुरुषोत्तम मेला शुरू हो चुका है! आस्था और आध्यात्म के इस महापर्व का रविवार को भव्य आगाज हुआ, जिसमें लाखों श्रद्धालु उमड़ने को तैयार हैं। यह विश्वप्रसिद्ध मेला 17 मई से 15 जून तक चलेगा।
राजगीर मलमास मेला: मुख्यमंत्री ने किया भव्य शुभारंभ, उमड़ा आस्था का सैलाब
नालंदा जिले के ब्रह्मकुंड परिसर में बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने वैदिक मंत्रोच्चार और विशेष पूजा-अर्चना के साथ मेले का उद्घाटन किया। उद्घाटन के दौरान उन्होंने ध्वजारोहण किया, महाआरती में शामिल हुए और श्रद्धालुओं के लिए की गई व्यवस्थाओं का जायजा लिया। मुख्यमंत्री ने प्रदेश की सुख-समृद्धि और शांति की कामना की। सनातन परंपरा के सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक आयोजनों में गिने जाने वाले इस मेले को लेकर देशभर से लाखों श्रद्धालुओं के पहुंचने की उम्मीद है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का No.1।
मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर लिखा कि ब्रह्मकुंड परिसर में पूजन और महाआरती में शामिल होने का अवसर मिला। उन्होंने श्रद्धालुओं की सुविधाओं और चल रही विकास योजनाओं का भी निरीक्षण किया। प्रशासन की ओर से सुरक्षा, साफ-सफाई, स्वास्थ्य और यातायात को लेकर विशेष इंतजाम किए गए हैं। ब्रह्मकुंड समेत विभिन्न गर्म जलकुंडों में स्नान करने के लिए श्रद्धालु सुबह से ही कतारों में दिखाई दिए।
क्या है मलमास मेले का धार्मिक महत्व?
मान्यता है कि अधिमास के इस विशेष काल में 33 कोटि देवी-देवता राजगीर में निवास करते हैं। इसी विश्वास के कारण हर बार राजगीर मलमास मेला में आस्था का विशाल सैलाब उमड़ता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मलमास के दौरान राजगीर में स्नान, दान, जप-तप और भगवान विष्णु की आराधना करने से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है। यही वजह है कि बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, बंगाल और देश के कई राज्यों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंच रहे हैं। होटल, धर्मशालाएं और आश्रमों में भी भीड़ बढ़ने लगी है। देश की हर बड़ी ख़बर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
वैतरणी नदी और पिंड दान की प्राचीन परंपरा
मलमास मेले के दौरान वैतरणी नदी भी श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र बन जाती है। शास्त्रीय मान्यताओं के मुताबिक इस अवधि में गया में पिंडदान नहीं किया जाता, क्योंकि देवी-देवता और पितरों का निवास राजगीर में माना जाता है। इसी कारण वैतरणी नदी के तट पर पिंडदान और तर्पण के लिए बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं। वैतरणी नदी से जुड़ी एक प्राचीन परंपरा भी श्रद्धालुओं को आकर्षित करती है। यहां गाय की पूंछ पकड़कर नदी पार करने की परंपरा निभाई जाती है। धार्मिक विश्वास है कि ऐसा करने से व्यक्ति भवसागर से मुक्ति प्राप्त करता है। इस धार्मिक आयोजन के दौरान यह दृश्य सबसे अधिक चर्चा का विषय बना रहता है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का No.1।
राजगीर मेले का आर्थिक और पर्यटन महत्व
राजगीर का यह धार्मिक आयोजन सिर्फ आस्था तक सीमित नहीं है। इससे स्थानीय पर्यटन और कारोबार को भी बड़ा सहारा मिलता है। मेले के दौरान होटल, परिवहन, खानपान और छोटे व्यापारियों की आय में बड़ा इजाफा होता है। प्रशासन को इस बार पिछले वर्षों की तुलना में अधिक भीड़ आने की संभावना है। नालंदा वासियों के लिए यह समय आर्थिक उन्नति का भी होता है।







