Madhubani Archaeology News: बिहार के मधुबनी जिले में स्थित बलिराजगढ़ का ऐतिहासिक पुरातात्विक स्थल इन दिनों पूरे देश के पुरातत्वविदों के लिए चर्चा का विषय बना हुआ है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) द्वारा चलाए जा रहे उत्खनन से प्राचीन मिथिला सभ्यता से जुड़े कई महत्वपूर्ण साक्ष्य सामने आ रहे हैं। ये प्रमाण ‘मिथिला नगर’ के एक समृद्ध और विशाल स्वरूप के दावों को मजबूत कर रहे हैं।
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प्राचीन ‘मिथिला नगर’ के जीवंत साक्ष्य
टीलों की गहराई से लगभग दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व के अवशेष मिल रहे हैं। इनमें प्राचीन सिक्के, मृदभांड और विशाल दीवारें शामिल हैं, जो मिथिलांचल के गौरवशाली इतिहास की पुष्टि करती हैं। इंटैक (INTACH) बिहार स्टेट के सह-संयोजक डॉ. शिव कुमार मिश्र ने हाल ही में पुरातात्विक स्थल का निरीक्षण किया है। उन्होंने दावा किया है कि ये साक्ष्य बौद्ध साहित्य के प्रसिद्ध ग्रंथ ‘महाउम्मग जातक’ में वर्णित भव्य मिथिला नगर की संरचना से मेल खाते हैं।
ग्रंथों के अनुसार, उस प्राचीन नगर के चारों कोनों पर चार बड़े प्रवेश द्वार हुआ करते थे, जहां बड़े बाजार लगते थे। नगर के केंद्र में राजमहल और प्रशासनिक भवन स्थित थे। वर्तमान उत्खनन में मिल रहे नगर नियोजन के संकेत और विशाल परकोटे इसी प्राचीन नगरीय व्यवस्था की ओर इशारा कर रहे हैं। इन खोजों ने Mithila History News को एक नई दिशा दी है।
मौर्यकालीन दीवारें और बहुमूल्य अवशेष
इस महत्वपूर्ण स्थल की महत्ता को देखते हुए, एएसआई भोपाल के वरिष्ठ पुरातत्वविद डॉ. जलज कुमार तिवारी के नेतृत्व में विशेषज्ञों की एक उच्च स्तरीय टीम ने उत्खनन कार्य का जायजा लिया है। इस टीम में डॉ. शिव कुमार मिश्र के साथ बापू टावर पटना के उपनिदेशक ललित कुमार सिंह और सीतामढ़ी के शोधकर्ता रामशरण अग्रवाल भी मौजूद थे। निरीक्षण के दौरान, युवा शोधार्थियों को वैज्ञानिक उत्खनन की बारीकियों से अवगत कराया गया। उन्हें लेयर निर्धारण, मैपिंग, फोटोग्राफी और पुरावशेषों के रासायनिक संरक्षण की महत्वपूर्ण जानकारी दी गई।
इस सत्र का उत्खनन 29 मार्च को शुरू हुआ था, और एएसआई की टीम अब तक लगभग 20 फीट की गहराई तक पहुंच चुकी है। किले के मध्य भाग और उत्तरी परकोटे की खुदाई के दौरान लगभग 2200 वर्ष पुरानी विशाल दीवारें मिली हैं। इतिहासकारों का मानना है कि बलिराजगढ़ में पहले भी पांच अलग-अलग सत्रों में खुदाई हो चुकी है, जिनसे शुंग, कुषाण और पाल कालखंड के अवशेष प्राप्त हुए थे। पिछली खुदाई में मौर्यकालीन ईंटें, एनबीपीडब्ल्यू (NBPW) के सिक्के, हाथी दांत की वस्तुएं, पक्की नालियां और बहुमूल्य मनके भी मिले थे, जो यहां की समृद्ध विरासत को दर्शाते हैं।
उत्खनन में बाधा, संग्रहालय और पर्यटन विकास
बलिराजगढ़ के ऐतिहासिक महत्व को विश्व स्तर पर पहचान दिलाने के लिए राजनीतिक स्तर पर भी प्रयास किए जा रहे हैं। राज्यसभा सांसद और जदयू के कार्यकारी राष्ट्रीय अध्यक्ष संजय कुमार झा ने हाल ही में केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत से नई दिल्ली में मुलाकात की। उन्होंने केंद्रीय मंत्री से बलिराजगढ़ के व्यापक और निर्बाध उत्खनन के लिए कम से कम 10 वर्षों की एक दीर्घकालिक परियोजना स्वीकृत करने की मांग की है। इससे यह सुनिश्चित होगा कि यह महत्वपूर्ण कार्य बिना किसी रुकावट के जारी रह सके।
सांसद संजय झा ने 28 मार्च को उत्खनन कार्य का शुभारंभ करते हुए घोषणा की थी कि रामायण काल से जुड़े इस स्थल की पूरी वैज्ञानिक खुदाई से राजा विदेह की वास्तविक राजधानी का रहस्य सामने आ सकेगा। उन्होंने यह भी बताया कि उत्खनन से प्राप्त दुर्लभ सामग्रियों को संरक्षित करने के लिए यहां पटना म्यूजियम के मानकों पर आधारित एक आधुनिक संग्रहालय का निर्माण किया जाएगा। इस पहल से क्षेत्र में पर्यटन सर्किट का विकास होगा और स्थानीय युवाओं के लिए होटल, रेस्ट हाउस तथा अन्य माध्यमों से रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे।
इस बीच, राष्ट्रीय धरोहर की खुदाई की सुरक्षा को लेकर एक गंभीर चिंता भी सामने आई है। कुछ असामाजिक तत्वों द्वारा उत्खनन कार्य को बाधित करने और पुरास्थल से छेड़छाड़ करने की शिकायतें प्राप्त हुई हैं। एएसआई द्वारा की गई घेराबंदी, खूंटे और रस्सियों को तोड़ दिया गया है। आशंका है कि यार्ड में सहेजकर रखे गए कुछ प्राचीन अवशेष भी गायब हो गए हैं। रात के समय ट्रेंच में ईंटें गिराकर काम रोकने की भी कोशिश की गई।
इस घटना की गंभीरता को देखते हुए सदर एसडीपीओ-2 मनोज राम और स्थानीय थाना प्रभारी (एसएचओ) संतोष कुमार ने दल-बल के साथ मौके पर पहुंचकर स्थिति का जायजा लिया है। पुलिस अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि राष्ट्रीय संपत्ति के साथ खिलवाड़ करने वाले किसी भी व्यक्ति को बख्शा नहीं जाएगा। शरारती तत्वों की पहचान की जा रही है और क्षेत्र में पुलिस गश्त बढ़ा दी गई है। वर्तमान में किले के उत्तरी और दक्षिणी भागों में अलग-अलग ट्रेंच बनाकर खुदाई की जा रही है, जहां मोटी और टेढ़ी-मेढ़ी दीवारें मिली हैं। पानी के रिसाव जैसी तकनीकी बाधाओं के बावजूद, एएसआई इसकी अंतिम तह तक पहुंचने का प्रयास कर रही है।
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इस ऐतिहासिक कार्य को निर्बाध रूप से पूरा करने के लिए जिला प्रशासन के साथ-साथ स्थानीय मुखिया, सरपंच और वार्ड प्रतिनिधियों का सहयोग अत्यंत आवश्यक है। डॉ. शिव कुमार मिश्र ने कहा कि उन्होंने जिलाधिकारी मधुबनी और सांसद संजय झा से भी बात कर सुरक्षा व अन्य आवश्यक व्यवस्थाएं सुदृढ़ करने का आग्रह किया है।
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