सहरसा टेंडर घोटाला न्यूज़: बिहार में चल रहे बहुचर्चित टेंडर घोटाले ने अब नया मोड़ ले लिया है। विशेष निगरानी इकाई (SVU) ने सहरसा नगर निगम कार्यालय में छापेमारी की। इस कार्रवाई से हड़कंप मच गया है और बड़े खुलासे होने की उम्मीद है। एसवीयू की जांच से पता चला है कि इस घोटाले में एक नामजद ठेकेदार ने सरकारी तंत्र के छोटे से बड़े अधिकारियों तक अपना जाल फैला रखा था।
जांच एजेंसी को इस बात के भी सबूत मिले हैं कि ठेकेदार रिशु श्री ने नगर विकास विभाग में गहरे संबंध बनाए थे। इन संबंधों का मुख्य उद्देश्य सरकारी टेंडर जारी होने से पहले ही उसकी गोपनीय जानकारी हासिल करना था। इस जानकारी के दम पर रिशु श्री ने कई बड़े सरकारी ठेके हासिल किए, जिससे करोड़ों रुपये का चूना लगाया गया।
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गुप्त जानकारी और कंप्यूटर हेराफेरी का खेल
इस धांधली को अंजाम देने के लिए कार्यालयों के आईटी कर्मियों की भी मदद ली गई। आईटी स्टाफ ने बड़े पैमाने पर फाइलों और कंप्यूटर डेटा में हेराफेरी की। इसी वजह से जांच एजेंसी ने मामले में सरकारी गोपनीयता कानून की सख्त धाराएं भी जोड़ी हैं, जो इस घोटाले की गंभीरता को और बढ़ाती हैं। यह एक बड़ा देश की हर बड़ी ख़बर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें बिहार भ्रष्टाचार समाचार के तौर पर सामने आया है।
जांच में सामने आया है कि सरकारी कार्यालयों के कंप्यूटर ऑपरेटर भी इस अवैध खेल में शामिल थे। वे डिजिटल टेंडर दस्तावेजों को ठेकेदार रिशु श्री की सुविधा के अनुसार बदल देते थे, ताकि उसे आसानी से ठेके मिल सकें। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) को मिले व्हाट्सएप चैट से इस बात का खुलासा हुआ है कि पैसों के अवैध लेनदेन के लिए खास कोड वर्ड का इस्तेमाल होता था।
रिश्वत की रकम को सीधे नाम से बुलाने के बजाय चैट में ‘पैकेट’ कहा जाता था। जांच एजेंसी के हाथ लगे फॉरेंसिक सबूत यह दर्शाते हैं कि इस कोडिंग नेटवर्क के जरिए ही अफसरों तक नकद रकम सुरक्षित पहुंचाई जाती थी। यह एक सुनियोजित तरीके से किया जा रहा था ताकि किसी को शक न हो।
अधिकारियों के विदेशी दौरों का खर्च और कोडवर्ड
इस पूरे नेटवर्क में सिर्फ निचले कर्मचारी ही नहीं, बल्कि बड़े अधिकारी भी शामिल थे और उन्हें उपकृत किया जा रहा था। डिजिटल सबूतों से एक चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि रिशु श्री कुछ सीनियर अफसरों की विदेश यात्राओं का पूरा खर्च उठा रहा था। इन अफसरों के वीजा और हवाई टिकट का भुगतान करने के लिए हवाला नेटवर्क का सहारा लिया गया था, जिससे पैसे का स्रोत छुपाया जा सके।
इसके बदले में रिशु श्री की कंपनियों को बिना किसी रुकावट के करोड़ों रुपये के प्रोजेक्ट्स पास कर दिए जाते थे। यहां तक कि एक इंजीनियरिंग कॉलेज का काम पूरा होने का फर्जी सर्टिफिकेट (कम्प्लीशन सर्टिफिकेट) लेने के लिए भी सवा लाख रुपये की घूस दी गई थी। यह साफ तौर पर दर्शाता है कि भ्रष्टाचार किस हद तक फैला हुआ था।
जांच का दायरा बढ़ा, कई विभागों पर निगाह
बिहार प्रशासनिक सेवा के अधिकारी मुमुक्षु चौधरी के बयानों ने इस मामले में और भी खुलासे किए हैं। मुमुक्षु चौधरी ने स्वीकार किया है कि सीतामढ़ी का अतिरिक्त प्रभार पाने के लिए रिशु श्री ने बड़े अफसरों को 25 लाख रुपये भिजवाए थे। ईडी और एसवीयू अब मुमुक्षु चौधरी के पुराने दफ्तरों पर भी कड़ी नजर रखे हुए हैं। आने वाले दिनों में पटना नगर निगम, सीतामढ़ी और मधुबनी के दफ्तरों में भी जांच टीम पहुंच सकती है, जिससे इस घोटाले का दायरा और बढ़ सकता है।
इस घोटाले में हर स्तर पर कमीशन तय था। साइट का निरीक्षण करने वाले इंजीनियरों के लिए कुल प्रोजेक्ट राशि का एक प्रतिशत हिस्सा पहले से ही तय रहता था। इससे यह स्पष्ट होता है कि यह एक संगठित भ्रष्टाचार का मामला है। एसवीयू अब इस मामले में आर-पार के मूड में दिखाई दे रही है।
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जांच टीम ने तय किया है कि संदेहास्पद विभागों में साल 2018 से लेकर साल 2024 तक जितने भी टेंडर पास हुए हैं, उन सबकी दोबारा स्क्रूटनी की जाएगी। इन छह सालों में टेंडर किस ठेकेदार को मिला, उसकी कुल राशि कितनी थी और जमीन पर वास्तव में कितना काम हुआ, इन सभी बिंदुओं की गहराई से जांच होगी। गड़बड़ी मिलने पर संबंधित विभागों की फाइलें और डिजिटल रिकॉर्ड तुरंत जब्त किए जाएंगे, जिससे इस बड़े घोटाले से जुड़े सभी दोषियों को कानून के कटघरे में लाया जा सके।







