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Bihar MLC Election News: तेजस्वी का सिरदर्द, कुशवाहा का मंत्री पद दांव पर, जानें अंदर की बात!

बिहार विधान परिषद की 9 सीटों के लिए सियासी घमासान मचा है। महागठबंधन के पास सिर्फ एक सीट जीतने का मौका है, जिससे तेजस्वी यादव के लिए सही उम्मीदवार चुनना चुनौती है। उपेंद्र कुशवाहा के बेटे का मंत्री पद दांव पर है, जिसने मुकाबले को बेहद रोमांचक बना दिया है।

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Bihar MLC Election News: बिहार में विधान परिषद की नौ सीटों के लिए चुनावी गहमागहमी तेज हो गई है। सत्ताधारी एनडीए ने अपने उम्मीदवारों के नामों का ऐलान कर दिया है, लेकिन सबकी निगाहें अब महागठबंधन और उपेंद्र कुशवाहा पर टिकी हैं। राजद के लिए इस बार एक ही सीट जीतना संभव दिख रहा है, जिससे उसके लिए उम्मीदवार का चयन करना एक बड़ी चुनौती बन गया है।

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महागठबंधन के लिए ‘एक अनार सौ बीमार’

बिहार विधान परिषद की नौ सीटों के लिए होने वाले चुनाव में राष्ट्रीय जनता दल (RJD) ने अभी तक अपने प्रत्याशियों की घोषणा नहीं की है, जबकि सत्ताधारी एनडीए ने अपने पत्ते खोल दिए हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि गणितीय समीकरणों के अनुसार, विपक्षी महागठबंधन को इस चुनाव में सिर्फ एक सीट पर ही जीत मिल सकती है। ऐसे में, एक ही सीट के लिए कई बड़े और प्रभावशाली दावेदार होने के कारण, राजद के शीर्ष नेता और उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव के लिए उम्मीदवार का चुनाव करना एक गंभीर चुनौती बन गया है। यह स्थिति ‘एक अनार सौ बीमार’ वाली कहावत को चरितार्थ कर रही है।

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विधान परिषद सदस्य (MLC) का चुनाव जीतने के लिए कम से कम 28 विधायकों के समर्थन की आवश्यकता होती है। आंकड़ों पर गौर करें तो, राजद के पास वर्तमान में अपने 25 विधायक हैं। इसका सीधा मतलब है कि उसे जीत हासिल करने के लिए असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी (AIMIM) और कांग्रेस जैसे सहयोगी दलों के कम से कम तीन अतिरिक्त विधायकों के समर्थन की अनिवार्य रूप से आवश्यकता होगी। यह निर्भरता पार्टी के भीतर और गठबंधन सहयोगियों के बीच एक जटिल स्थिति पैदा कर रही है।

राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव की हालिया सिंगापुर यात्रा के बाद, उनकी बड़ी बेटी रोहिणी आचार्य का नाम भी इस प्रतिष्ठित सीट के लिए संभावित उम्मीदवारों की सूची में शामिल हो गया है। यदि तेजस्वी यादव अंततः रोहिणी आचार्य के नाम पर मुहर लगाते हैं, तो पार्टी को एक बार फिर राजनीतिक गलियारों में परिवारवाद के पुराने और घिसे-पिटे आरोपों का सामना करना पड़ सकता है, जिससे उनकी छवि पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। इसके अतिरिक्त, राबड़ी यादव के मुंहबोले भाई और एक समय पार्टी के प्रभावशाली नेता रहे सुनील सिंह भी इस सीट के लिए अपनी मजबूत दावेदारी पेश कर रहे हैं। बिस्कोमान के चुनाव में हार झेलने के बाद उनके राजनीतिक वजूद पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं, और यह विधान परिषद सीट उनके लिए एक महत्वपूर्ण वापसी का जरिया बन सकती है। सुनील सिंह की लॉबिंग और पार्टी में उनकी गहरी पैठ को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

उपेंद्र कुशवाहा और मंत्री पद का संकट

सत्ताधारी एनडीए द्वारा अपनी उम्मीदवारों की सूची जारी किए जाने के बाद, अब सबकी निगाहें बिहार की राजनीति में एक महत्वपूर्ण खिलाड़ी, उपेंद्र कुशवाहा के अगले राजनीतिक कदम पर टिकी हैं। उनके बेटे और मौजूदा सम्राट चौधरी सरकार में कैबिनेट मंत्री दीपक प्रकाश का मंत्री पद भी इस विधान परिषद चुनाव के नतीजों से सीधे तौर पर जुड़ा हुआ है। नियमानुसार, यदि दीपक प्रकाश इस चुनाव में विधान परिषद सदस्य के रूप में चुने नहीं जाते हैं, तो उन्हें अपने मंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ सकता है। इस कारण, कुशवाहा के लिए यह चुनाव व्यक्तिगत और राजनीतिक दोनों ही दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण हो गया है।

अगर उपेंद्र कुशवाहा नौवीं सीट के लिए अपने बेटे को मैदान में उतारने का साहसिक फैसला करते हैं, तो यह मुकाबला और भी अधिक दिलचस्प और अनिश्चित हो सकता है। ऐसी स्थिति में, पहले वरीयता वाले वोटों के अलावा, दूसरे वरीयता वाले वोटों का महत्व काफी बढ़ जाता है, जो जीत-हार का अंतर तय करने में निर्णायक साबित हो सकता है। यह संभावना राजनीतिक पंडितों के बीच चर्चा का विषय बनी हुई है।

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इस जटिल चुनावी परिदृश्य में, राजद की ओर से सुनील सिंह की दावेदारी को कुछ हद तक मजबूत माना जा रहा है। सुनील सिंह की पार्टी में गहरी पैठ और विभिन्न विधायकों के साथ उनके व्यक्तिगत संबंध ऐसी स्थिति में उनके पक्ष में जा सकते हैं। यह जगजाहिर है कि ऐसी परिस्थितियों में, खासकर जब मुकाबला कांटे का हो, राजनीतिक गलियारों में जमकर ‘हॉर्स ट्रेडिंग’ यानी विधायकों की खरीद-फरोख्त की आशंकाएं हमेशा बनी रहती हैं। पिछले चुनावों में भी ऐसे आरोप लगे हैं, जिससे यह चुनाव और भी रहस्यमय बन गया है।

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कांग्रेस और ओवैसी की बढ़ी डिमांड

हाल ही में संपन्न हुए बिहार राज्यसभा चुनाव में भाजपा के उम्मीदवार शिवेश राम की अप्रत्याशित जीत ने सभी राजनीतिक दलों को चौंका दिया था। उस चुनाव के दौरान भी ‘हॉर्स ट्रेडिंग’ यानी विधायकों के पाला बदलने और खरीद-फरोख्त के गंभीर आरोप लगे थे, जिससे बिहार की राजनीति में एक बार फिर नैतिकता के सवाल खड़े हो गए थे। विशेष रूप से, कांग्रेस पार्टी के तीन विधायकों ने अपनी पार्टी के आधिकारिक रुख से हटकर एनडीए उम्मीदवार के पक्ष में मतदान किया था, जिसने राजनीतिक हलकों में काफी हलचल मचाई थी।

ये तीनों कांग्रेस विधायक हाल के दिनों में भी अपनी पार्टी की महत्वपूर्ण बैठकों और कार्यक्रमों से लगातार दूरी बनाए हुए दिखते हैं। उनकी यह निष्क्रियता और पार्टी से अलगाव की स्थिति उनकी निष्ठा पर गंभीर सवाल खड़े करती है, और भविष्य में उनके राजनीतिक रुख को लेकर अटकलों का बाजार गर्म है। इन विधायकों का अगला कदम विधान परिषद चुनाव के समीकरणों को भी प्रभावित कर सकता है।

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दूसरी ओर, असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम ने राज्यसभा चुनाव में विपक्ष का साथ दिया था और उनके सभी विधायकों ने महागठबंधन के उम्मीदवार के पक्ष में ईमानदारी से वोट डाला था। अब इसके बदले में, एआईएमआईएम राजद से विधान परिषद की एक सीट की मांग कर रही है। यदि राष्ट्रीय जनता दल उनके इस अनुरोध को स्वीकार नहीं करती है या उनकी मांगों को नजरअंदाज करती है, तो नौवीं सीट के लिए होने वाला मुकाबला बेहद रोमांचक और अप्रत्याशित मोड़ ले सकता है। एआईएमआईएम के विधायकों का रुख इस चुनाव में निर्णायक भूमिका निभा सकता है, जिससे राजनीतिक समीकरण और अधिक जटिल हो जाएंगे और जीत-हार का फैसला बहुत छोटे अंतर से हो सकता है।

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इस पूरे चुनावी घटनाक्रम में सभी राजनीतिक प्रेक्षकों और आम जनता की निगाहें अब तेजस्वी यादव और उपेंद्र कुशवाहा के अगले फैसलों पर टिकी हैं। यह देखना दिलचस्प होगा कि वे अपने-अपने उम्मीदवारों के चयन और राजनीतिक रणनीतियों को लेकर क्या निर्णय लेते हैं। यह विधान परिषद चुनाव बिहार की राजनीति में कई नए समीकरणों को जन्म दे सकता है और आने वाले समय में सत्ता पक्ष व विपक्ष के बीच राजनीतिक खींचतान को और भी अधिक बढ़ा सकता है, जिससे राज्य की सियासी तस्वीर बदल सकती है।

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