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मंथन ही पाटेगा 2019 का फासला

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Image result for पांच राज्यों के चुनाव परिणाम का कोलाज

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स्पेशल डेस्क देशज टाइम्स । पांच राज्यों में हुए चुनाव के नतीजे आते ही राजनीतिक गलियारों में आंधी सी आ गई है। इसके पीछे कई प्रमुख कारण है। उन कारणों में सबसे अधिक आसन्न 2019 लोकसभा पर इस परिणाम से उस चुनाव पर पड़ने वाली असर की चिंता है। लोगों और चुनावी पंडितों के विश्लेषण में भी यह बात स्पस्ट रूप से दिख रहा है। परिणामों को देखने के बाद यह प्रतीत हो रहा है कि अब भारत की लोकतंत्र सचमुच में चुनाव तिथि से पहले अपनी एक सर्वमान्य मनोदशा बना लेती है। मूलरूप से देखा जाए तो अब तक तंत्रों का शिकार बनती रही लोकतंत्र अब समय आने पर तंत्र को भी अपना शिकार बनाने में महारथ हासिल कर चुकी है। 2014 के लोकसभा में भी उसने यही बात दृष्टि गोचर कराई थी।

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मंथन ही पाटेगा 2019 का फासला पचीस सालों से कायम परंपरा को ही तरजीह

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अगर इन चुनाव के परिणामों का राज्यवार विश्लेषण करें तो मध्यप्रदेश में यह स्पस्ट रूप से दिखता है कि भाजपा को सवर्णो में व्याप्त राजनीतिक नाराजगी को झेलना पड़ा है। वहीं, राजस्थान में मतदाताओं ने पिछले पचीस सालों से कायम परंपरा को ही तरजीह दी है यानि पांच पांच सालों पर दोनों राष्ट्रीय दलों को मौका देते रहने का। पर मुख्यमंत्री वसुंधरा के साथ साथ दो तिहाई मंत्रियों के हार से सत्ता दल के प्रति व्याप्त मतदातों के तीव्र आक्रोश भी झलक रहा है जिसका संबंध कहीं ना कहीं से सवर्णो की नाराजगी से भी है। वहीं, वसुंधरा राजे से पार्टी की नाराजगी भी इस हार के पीछे एक कारण रही है। वहीं, छतीसगढ़ में आदिवासियों का कांग्रेस के प्रति उभरे झुकाव के आगे अजित जोगी व रमन सिंह मिलकर भी कांग्रेस को सत्ता में आने से नही रोक पाई और भाजपा को ऐतिहासिक हार का सामना करना पड़ा। अगर तेलंगना की बात की जाय तो यह स्पस्ट है कि चंद्रशेखर राव का जादू अभी भी पूरी तरह बरकरार है और इसे देखने से 2014 में व्याप्त नरेंद्र मोदी के जादू की याद बरबस ही आ जाती है।

बड़बोलेपन से बच गंभीर मंथन करने की जरूरतमंथन ही पाटेगा 2019 का फासला

चुनाव परिणाम से कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व के साथ-साथ समस्त कार्यकर्ताओं को एक प्राणवायु मिल गया है।अर्से बाद उन्हें ढोल नगाड़े पर थाप देने का मौका मिला है। पर कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व को याद रखनी चाहिए कि उन्हें जीत जरूर मिल गई है पर भाजपा इन पांचों राज्यों में हारने के बावजूद 64 फीसद आबादी पर अभी भी राज कर रही है।आगामी लोकसभा चुनाव को देखते हुए भाजपा को गंभीर मंथन करने की आवश्यकता है, जिसके केंद्र में जमीनी कार्यकर्ताओं की सलाह हो। साथ ही पार्टी के प्रवक्ताओं को शब्दजाल बुनने की निपुणता प्रदर्शित करने के बजाए बेहतर जनहित के फैसले पर शीघ्र निर्णय कर उसे कार्यरूप में तब्दील करने पर बल देनी चाहिए क्योकि अभी भी भारत विकासशील देशों की श्रेणी में ही आती है और लोगों का सोच भी उसी के आस पास केंद्रित है।

मंथन ही पाटेगा 2019 का फासला

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