Bihar Politics: कभी मोकामा और आसपास के इलाकों में दबदबे के लिए जाने जाने वाले सूरजभान सिंह की तबीयत अचानक बिगड़ गई है। करीब एक सप्ताह पहले पटना स्थित आवास पर सीने में तेज दर्द के बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था। शुरुआती इलाज के बाद उन्हें दिल्ली ले जाया गया और अब चेन्नई रेफर किए जाने की जानकारी सामने आई है। इस खबर के साथ ही बिहार की सियासत में एक बार फिर सूरजभान सिंह की चर्चा तेज हो गई है। उनकी जिंदगी की कहानी अपराध, गैंगवार, जेल और फिर चुनावी राजनीति से संसद तक पहुंचने के नाटकीय मोड़ से भरी है।
सूरजभान सिंह का नाम पूर्व मंत्री बृजबिहारी प्रसाद हत्याकांड से लेकर उत्तर प्रदेश के कुख्यात अपराधी श्रीप्रकाश शुक्ला से संबंधों तक कई बड़े मामलों में आया। हालांकि, बृजबिहारी प्रसाद हत्याकांड में सुप्रीम कोर्ट ने 2024 में उन्हें सबूतों के अभाव में बरी कर दिया था। मोकामा के एक किसान परिवार से निकलकर बाहुबली और फिर सांसद बनने तक का उनका सफर बेहद उतार-चढ़ाव भरा रहा है।
पिता चाहते थे फौजी बने बेटा, लेकिन सूरजभान ने चुना दूसरा रास्ता
सूरजभान सिंह का जन्म 5 मार्च 1965 को पटना जिले के मोकामा के शंकरबाग टोले में हुआ था। उनके परिवार की आर्थिक स्थिति सामान्य थी। उनके पिता एक स्थानीय कारोबारी की दुकान पर काम करते थे। सूरजभान के बड़े भाई CRPF में भर्ती हुए, जिससे परिवार की स्थिति में कुछ सुधार आया। पिता की इच्छा थी कि छोटा बेटा भी सेना में जाए। उन्होंने सूरजभान से कहा भी था कि उनकी लंबी कद-काठी और दौड़-भाग की क्षमता सेना के लिए उपयुक्त है, इसलिए उन्हें सेना की तैयारी करनी चाहिए।
लेकिन सूरजभान का मन कुछ और ही था। उन्होंने सेना में भर्ती होने की बजाय अपनी अलग राह चुनी, जो धीरे-धीरे उन्हें अपराध की दुनिया की ओर ले गई। रिपोर्टों के अनुसार, 18 साल की उम्र से पहले ही उनका नाम छोटे-मोटे अपराधों में आने लगा था। बाद में वह मोकामा के प्रभावशाली नेता और बाहुबली दिलीप सिंह के संपर्क में आए। उस दौर में मोकामा की राजनीति और अपराध एक-दूसरे से गहरे जुड़े हुए थे, और इसी माहौल में सूरजभान का दबदबा बढ़ता गया।
परिवार पर गहरा असर और फिर जेल से राजनीति में एंट्री
सूरजभान के अपराध की दुनिया में बढ़ते कदमों का उनके परिवार पर गहरा असर पड़ा। एक रिपोर्ट के मुताबिक, उनके पिता के परिचित एक कारोबारी से रंगदारी मांगी गई। कारोबारी ने सूरजभान के पिता से शिकायत की, जिसके बाद पिता ने बेटे को इस रास्ते से हटने के लिए समझाया। लेकिन सूरजभान नहीं माने। इस घटना से उनके पिता इतने आहत हुए कि उन्होंने आत्महत्या कर ली। कुछ समय बाद उनके बड़े भाई ने भी आत्महत्या कर ली, जिससे परिवार में गहरा दुख छा गया।
1990 के दशक में दिलीप सिंह के मंत्री बनने के बाद, सूरजभान का प्रभाव और बढ़ा। इसी दौरान उनका नाम जमीन विवाद, हत्या और अन्य आपराधिक मामलों में सामने आता रहा। 1997 में पुलिस मुठभेड़ के दौरान उनके पैर में गोली लगी। इलाज के लिए उन्हें कई जगहों पर भटकना पड़ा, यहां तक कि नेपाल भी जाना पड़ा। आखिरकार बिहार पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया और वह जेल चले गए। यहीं से उनकी जिंदगी में एक बड़ा मोड़ आया।
श्रीप्रकाश शुक्ला से संबंध और बृजबिहारी प्रसाद हत्याकांड
सूरजभान सिंह का नाम उत्तर प्रदेश के कुख्यात अपराधी श्रीप्रकाश शुक्ला से जुड़ा। पूर्व IPS अधिकारी राजेश पांडेय के अनुसार, रेलवे ठेकों में दिलचस्पी के कारण सूरजभान की मुलाकात श्रीप्रकाश शुक्ला से हुई थी। पांडेय ने अपनी किताब ‘वर्चस्व’ में बताया है कि सूरजभान ने श्रीप्रकाश शुक्ला को दो AK-47 देने की बात कही थी, जिसके बदले वीरेंद्र प्रताप शाही को रास्ते से हटाने की योजना थी। शाही पर हमला हुआ, जिसमें उनका गनर मारा गया और शाही घायल हुए। यह वह दौर था जब उत्तर भारत में AK-47 का इस्तेमाल अपराध की दुनिया में चर्चा में आया।
उनके राजनीतिक जीवन का सबसे चर्चित मामला पूर्व मंत्री बृजबिहारी प्रसाद की हत्या से जुड़ा है। 13 जून 1998 को पटना के IGIMS परिसर में बृजबिहारी प्रसाद की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। इस मामले में सूरजभान समेत कई लोगों के नाम सामने आए। निचली अदालत ने 2009 में कई आरोपियों को उम्रकैद की सजा सुनाई, लेकिन 2014 में पटना हाईकोर्ट ने सबूतों के अभाव में सभी को बरी कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने अक्टूबर 2024 में दो आरोपियों की सजा बरकरार रखी, जबकि सूरजभान सिंह समेत अन्य को संदेह का लाभ देते हुए बरी करने का फैसला कायम रखा।
जेल से विधायक और फिर संसद तक का सफर
साल 2000 का बिहार विधानसभा चुनाव सूरजभान के लिए निर्णायक साबित हुआ। जेल में रहते हुए भी उन्होंने मोकामा विधानसभा सीट से निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ा। उनके सामने पुराने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी दिलीप सिंह थे। चुनाव परिणामों ने सबको चौंका दिया, जब सूरजभान सिंह ने 1,02,499 वोट हासिल कर दिलीप सिंह (43,028 वोट) को करीब 59 हजार वोटों से हराया। जेल में रहते हुए एक बाहुबली का विधायक बनना बिहार की राजनीति की एक बड़ी घटना थी।
विधायक बनने के बाद सूरजभान सिंह ने राष्ट्रीय राजनीति की ओर कदम बढ़ाया। 2004 में उन्होंने रामविलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी (LJP) का दामन थामा और बलिया लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा। वह चुनाव जीत गए और संसद तक पहुंचे। हालांकि, बेगूसराय के किसान रामी सिंह की हत्या के मामले में निचली अदालत से उम्रकैद की सजा मिलने के बाद उनकी चुनावी पारी पर विराम लग गया।
परिवार ने संभाली राजनीतिक विरासत
चुनाव लड़ने पर कानूनी रोक लगने के बाद भी सूरजभान सिंह का राजनीति से रिश्ता खत्म नहीं हुआ। उनकी पत्नी वीणा देवी ने राजनीतिक विरासत संभाली और 2014 में मुंगेर लोकसभा सीट से सांसद बनीं। 2018 में उनके बड़े बेटे की सड़क हादसे में दुखद मौत हो गई। 2019 में उनके भाई चंदन सिंह नवादा से लोकसभा चुनाव जीतकर सांसद बने। इस तरह, जिस परिवार की पहचान कभी मोकामा के बाहुबली के तौर पर थी, वह संसद और चुनावी राजनीति में अपनी जगह बना चुका था।
2021 में लोक जनशक्ति पार्टी में टूट के बाद, सूरजभान सिंह ने पशुपति कुमार पारस के नेतृत्व वाले गुट, राष्ट्रीय लोक जनशक्ति पार्टी का साथ दिया। 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में उन्होंने अपनी पत्नी वीणा देवी को RJD के टिकट पर मोकामा से मैदान में उतारा, लेकिन वह अनंत सिंह से हार गईं। सूरजभान सिंह की यह कहानी 1990 और 2000 के दशक की बिहार की उस राजनीति को दर्शाती है, जिसमें बाहुबलियों का प्रभाव चरम पर था और कैसे उन्होंने अपराध की दुनिया से निकलकर सत्ता के गलियारों तक अपनी पैठ बनाई।







