सरकारी कार्य संस्कृति में इतने पेंच हैं, आम आदमी थककर चूर हो जाए एक कागज इधर से उधर सरकारी दफ्तर में हो ना पाए। हकीकत यही है, सरकारी व्यवस्था ने हर आम इंसान को शक की सूची में डाल दिया है। चाहे एक बैंक में खाता खुलवाने की बात हो आप बैंक जाएं वहां के मैनेजर से मिलें इतने सवाल पूछेंगे, कागजात मांगेंगे कि एक सरल सोच वाला इंसान भी अपराधियों की फेहरिस्त में शामिल होता मिलेगा। लगेगा जैसे मैंने गुनाह कर ली हो बैंक में खाता खुलवाने के लिए आकर यही हाल कमोबेश हर सरकारी दफ्तर में है जहां आम इंसान को बिना दौड़ाए उनके चरित्र का सत्यापन तक नहीं हो रहा। हालात यही है, आसमानों से फ़रिश्ते जो उतारे जाएं, वो भी इस दौर में सच बोलें तो मारे जाएं..।
आसमानों से फ़रिश्ते जो उतारे जाएं, वो भी इस दौर में सच बोलें तो मारे जाएं..
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