
नया साल बेहद करीब है। लोगों की तैयारी सर्द रातों में, दिन के कुहासों से शुरू हो गई है। ऐसे में, गरीबों का अपना नया साल होता है जिन्हें अमीरी की सुंगध कतई नहीं भाती। कारण, गरीबों का दुःख तो सब जताते हैं मगर कोई आंसू नहीं पोछता। अपनी रोटी में से एक दे दूं, कोई नहीं सोचता। मगर तय मानिए, जिस दिन लोगों की सोच बदल जाएगी, गरीबी व भुखमरी नजर नहीं आएगी। कितना लुटाते हो खुशियां मनाने में और जेब फट जाती है रोटी खिलाने में। अजब तेरी कुदरत, गजब तेरी माया। तूने भी कैसा इंसान बनाया। अकेले तुम्हीं सब उड़ाओगे भाई कि मेरी तरफ़ भी बढ़ाओगे भाई। तुम्हीं पी रहे हो, तुम्हीं खा रहे हो तुम्हीं बांधकर भी लिए जा रहे हो कहां का नियम है बताओगे भाई। बहुत हो चुका अब नहीं मैं सहूंगा कहूंगा, कहूंगा, कहूंगा, कहूंगा कहां तक मुझे तुम दबाओगे भाई। सोचते दिमाग़ों को नापती निगाहों को गारे सने हाथों को डामर सने पांवों को उन सबको जिन्होंने सड़क इमारतें बनाई कमाल की शुभकामनाएं नए साल की दादा कहते हैं, नया साल जब-जब आता है महंगाई की फुटबॉल को थोड़ा और फुला जाता है। ग़रीबी की चादर में, एक पैबंद और लगाकर भ्रष्टाचार का प्रमोशन कर जाता है। उनको जो पता नहीं कब आए कब गए फ्लाइओवर बनाते हुए दब गए जिनके परिवारों को चिंता है रोटी की दाल की शुभकामनाएं नए साल की।
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