



सतीश चंद्र झा, बेनीपुर। मिथिलांचल में कभी प्रसिद्ध गृह उद्योग का दर्जा प्राप्त बांस की टोकरी निर्माण कार्य प्रायः मृत प्राय हो गई है, लेकिन इस छठ महापर्व के अवसर पर प्रखंड क्षेत्र के दर्जनों महादलितों (डोम) परिवार इसे जीवटता प्रदान करने में जुटे हुए हैं।
पुश्तैनी पेशा से विमुख होकर ये कहां जा रहे हम
मिथिलांचल के ग्रामीण क्षेत्रों में अपने आवश्यकतानुसार गृह उद्योग चलाकर जीविकोपार्जन में शामिल प्रमुख गृह उद्योग बांस की टोकरी निर्माण में पूर्व के समय में महादलित परिवार के बच्चे, बूढ़े और जवान तो जुटे ही रहते थे और ततमा, बॉतर और मल्लाह जाति के कुछ उप जातियां का भी बॉस से विभिन्न बर्तनों का निर्माण कर जीविकोपार्जन का मुख्य साधन हुआ करता था।
लेकिन आधुनिकीकरण के दौर में यह उद्योग लगभग मृत प्राय हो चुका है,और इससे जुड़े विभिन्न जातियों के लोग अपने परंपरागत पेशा को छोड़ या तो परदेश का रुख कर रहे हैं या फिर पुश्तैनी पेशा से विमुख होकर अन्य कार्य में लग चुके हैं।
सामाजिक कार्यकर्ता संजय कुमार सिंह उर्फ पप्पु सिंह एवं शंभू सिंह बताते हैं कि आधुनिकता के दौर में बांस के बर्तनों की जगह प्लास्टिक और चदरे से बने बर्तन लोग ज्यादा व्यवहार में लाने लगे हैं ा फलस्वरूप उक्त व्यवसाय मृत प्राय होता जा रहा है।
दूसरी ओर बांस की किल्लत भी एक प्रमुख कारण है। इधर मिथिला, मैथिली की सेवा में जूटे प्रोफ़ेसर देवेंद्र झा बताते हैं की मिथिला में बांस की टोकरी की समृद्धि परंपरा का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है की किसी भी भाषा में एक के अलावा दूसरा नाम टोकरी का नहीं है जबकि मैथिली में आकार के अनुसार बांस के बने टोकरी को ढाक, ढाकी, छिट्टा पथिया, दौरी, मोनी एवं भौकी के नाम से लोग जानते हैं।
यह बेहतर व्यवसाय है, मगर
दूसरी ओर पोहद्दी गांव के इस परंपरागत पेशे से जुड़े जगदीश मल्लिक ,सीताराम मल्लिक ,रंजीत मल्लिक एवं बेनीपुर के मिथिलेश मल्लिक, अरुण मलिक, कमलेश मलिक, प्रमोद मलिक, बैजनाथ मल्लिक एवं महिलाओं में अनीता देवी, प्रमिला देवी, सुमित्रा देवी आदि बताती हैं कि अब भावी पीढ़ी के बच्चे इस व्यवसाय से नहीं जुड़ना चाहते हैं।
कहती हैं, वह भी अब परदेस का रुख ही करना चाहते हैं और आधुनिकता के दौर में जीने को ललक बन रही है। हम लोग पुराने समय से इस परंपरागत पेशा से जुड़े हुए हैं तो इस छठ महापर्व के अवसर पर 2 माह पूर्व से ही टोकरी, डगरा, कोनिया, सूपती आदि बनाकर सामाजिक परंपरा का निर्वहन कर रहे हैं।
अपना भी जीविकोपार्जन चल रहा है,लेकिन सरकारी स्तर पर इसे जीवंत रखने के लिए कोई पहल नहीं की जा रही है नहीं तो यह एक जीविकोपार्जन के लिए अच्छी व्यवसाय हो सकती है।




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