



अपने लहू से सिंचा है उन परवानों ने, यूंही नहीं ये वादियां जन्नत कहलाती हैं, मगर चंद घूसखोर देश बदलने की जिद लिए बैठे हैं। चोरी करते पकड़े गए तो कमीशन देकर मुंह बंद कराने की कोशिश होती है। मगर जानते नहीं हैं वो, आज भी खड़ी है रुह–ए–आशिक़ इन सरहदों पे, आज़माना है किसी को अपना ज़ोर तो आए, पूछा खुदा ने काफी कत्ल किए हैं उस जहां ने, बोला, आशिक–ए–वतन हूं गुनाहों की हर सज़ा मंजूर है।
हालात यही है, स्कूलों में मध्याह भोजन के नाम पर, रेलवे में कैंटिन के नाम पर, बस स्टैंड में ठेकेदारी के नाम पर, सरकारी दफ्तरों में हर बात पर कमीशन का खेल, राफेल से लेकर बोफर्स तक हर जगह कमीशन में उपलता देश ना जाने किस मुकाम पर जाकर थमेगा।
ऐसे में, करके नम अपने चशम, बोले निज़ाम ए आलम, ऐसे दलेर आशिक से पहली दफा पाला पड़ा है। बोला, खुदा कतार बहुत लंबी है अभी आने वालों की,कमी नहीं है मेरे मुल्क में उसपर मर मिटने वालों की।



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