



सच मानो तो, मनोरंजन ठाकुर के साथ
हवा के साथ उड़ गया घर उस परिंदे का,
कैसे बना था घोंसला वो तूफान क्या जानें।
सचमुच, उस तूफान में पहले से तिनका-तिनका टूटा हर इंसान, तनिक सी छुअन में टूट जाए। यही कुछ हुआ। चंद रसरी के फंदे में पांच लाशें क्या निकलीं। जातिवाद, व्यक्तिवाद, सरकारवादी, विपक्षवादी सबके सब नंगे हो गए।
उस आवाम का बेपर्द चेहरा अनायास झकझोरा ही नहीं, सोचने-समझने की शक्ति क्षीण करते वहां पहुंच गया जहां सारे रास्ते सिमटते, बंद मुठ्ठी को खोलने की ताकत, उस सिस्टम के भरोसे रहा नहीं जहां पहले हाथों में खैरातों की पोटली और फिर सूदखोरों के महाजाल में फंसने की मजबूरी, दोनों साफ-साफ दिखी। दोष किसे दें? फर्क कहां मिला?
समस्तीपुर के विद्यापतिनगर के मऊ गांव ने जो कुछ भोगा, देखा, रातों के सन्नाटें में जलती लाशों की लंबी लहास में उन शब्दों की बकबकी अनायास, विकराल होती गई जहां, पहले से खोने को कुछ बचा, शेष कहां था। जो था, वह चमड़े की चंद शरीरें थी, जो सूतली पर सो गई।
मगर, सवाल है, मरा कौन? वो पांच लाशें? जिनका अभी-अभी अंतिम संस्कार की रस्म पूरी हुई है। या कोई और? वो, जो अंधेरे में बैठा है? वहां तक प्रशासन क्या नेताओं की हुकूमत भी नहीं चलती। सरकार की बात तो छोड़ ही दीजिए।
वो मौतों का सौदागर है। मौत का पेशा उसकी पैदाइश में है। खून की रोटी वो भी लहू से सनी आटें से बनी। मखमली तस्तरी में परोसकर हर रोज जो हर जाति-धर्म के नफस में अपनी पहुंच बना चुका है, उसकी कोई जाति नहीं है। वह सिर्फ मानवता का शत्रु है, जहां सरकार की आंखें अंध होकर दूसरी पंगत में खड़ी, दिखाई पड़ती है।
तंत्र लाचार है। बेबस है। उसकी बेबसी उसी लौ में दहकती कहीं मिलती है, जहां, इसी पटकथा के पहले हिस्से में परिवार का दादा पहले ही खुदकुशी कर उस जमींन की चादर में सोया हुआ मिला, जहां आज गंगा की सहायक नदी वाया के तट पर इन पांच शवों का दाह संस्कार प्रशासनिक देखरेख में रविवार की देर रात स्वजनों, रिश्तेदारों और ग्रामीणों की उपस्थिति में हुआ है।
यानी, सच यही है, एक मौत पहले भी इसी पटकथा में हो चुकी है। और वही इस कहानी की जड़ है जहां आज पांच लोगों के दैह में आग झोंकने के बाद हर किसी का दिल दहल उठा, तो परिजनों और रिश्तेदारों के आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे।
वहीं, मौजूद लोगों की भी आंखें नम थी जो इन पांचों शवों को मुखाग्नि मनोज के छोटे दामाद खुसरूपुर के आशीष मिश्रा के हाथों पड़ते ही फफक पड़ी थी। उपस्थित सैकड़ों लोगों की आंखें कई सवालों के साथ दहकती चिताओं के आगे मौन, बुत यक्ष प्रश्न के साथ यथावत तबतक खड़े रहे, जब तक सबकुछ राख नहीं हो गया। मगर सवाल अब भी दहक ही रहे थे। उसी लौ में…
दु:ख किसे नहीं है। दु:ख सरकार को है। विपक्ष को है। सरकार के सहयोगियों को है। सोशल मीडिया के रहनुमाओं को है। हमें है। आपको है। मगर, इस दु:ख, पीड़ा का आवेग थमेगा कहां, कहां जाकर रूकेगा। बस, यही अब अंत है। इसे अंत मान लिया जाए। या फिर…आगे की सोच में कुछ बाकी, शेष है।
समस्तीपुर में एक ही परिवार के पांच लोगों का शव कमरे में फंदे से लटकते मिलना, यह पुलिस को प्रथमदृष्ट्या खुदकुशी ही लगी रही है। लेकिन, इस मामले की अब जांच की जाएगी। यह आत्महत्या है या हत्या। कारण, ऐसे कयास भले हैं, यह मामला खुदकुशी का है। लेकिन, इसकी जांच अभी बाकी है। इस मामले में परिजनों के आवेदन पर केस भी दर्ज किए जाएंगें। मृतक मनोज झा की बेटी काजल की मानें जिसने पूरे प्रकरण को हत्या की आशंका से देखा है। ऐसे में, तय है इसकी जांच की जाएगी, और होनी भी चाहिए।
मऊ गांव के एक छोटे से परिवार के गृह स्वामी, उनकी मां, पत्नी और दो मासूम पुत्रों की सामूहिक खुदकुशी कई सवाल खड़े करते हैं। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भी समस्तीपुर सामूहिक खुदकुशी पर दु:ख जताते हुए अधिकारियों को पूरी जानकारी जुटाने का निर्देश दिया। सीएम ने कहा, यह अफ़सोस की बात है। समाचार आते ही मैंने व्यक्तिगत रूप से पूछताछ की। इस मामले को पूरा प्रशासन देख रहा है। वे इस बात का आंकलन कर रहे हैं, आखिर एक ही परिवार के पांच लोगों ने आत्महत्या क्यों की?
जी हां, सवाल यही है, आखिर वो कौन सी मजबूरी, कौन सी विकट घड़ी आन पड़ी जिसने पांच लोगों को एकसाथ सामूहिक मौत को गले लगाने पर विवश किया। इसमें सबसे अहम है, खुदकुशी में सूदखोरों का आतंक। तीन लाख कर्ज का ब्याज इन सूदखोरों ने मांगें थे पूरे 18 लाख। इसे लेकर परिवार को प्रताड़ित किया जा रहा था। मृतक मनोज की बड़ी बेटी काजल का वो खुलासा पुलिस के बड़े काम आ सकता है, जिसमें उसने बताया, दादा ने मेरी शादी में गांव के एक व्यक्ति से तीन लाख कर्ज लिए थे। वह ब्याज जोड़कर अठारह लाख की मांग मेरे दादा और पिता से कर रहा था।
काजल कहती है
हर दिन उस सूदखोर की मनमानी, घौंस, मारपीट, घर आकर गाली-गलौज से तंग आखिर परिवार और क्या करता। इससे आजिज आकर दादा ने पहले ही खुदकुशी कर ली थी। कुछ दिन पूर्व एक कर्ज देने वाला पिता जी का ऑटो लेते गया था। घर की स्थिति पूरी तरह बिगड़, लड़खड़ा चुकी थी। पिता के पास दो कमरे की झोपड़ी के अलावे कुछ नहीं था। घर के पास खाली थोड़ी सी जमीन थी उसपर भी लोगों ने कब्जा कर रखा है।
कहानी यहीं खत्म नहीं होती।
बकौल काजल, पिता ने खैनी बेचने के साथ चार गाडिय़ां खरीदीं। कोशिश यही थी, घर की माली स्थिति किसी तरह ठीक किया जाए। परिवार को हर खुशी दी जा सकें, लेकिन ऐसा हो ना सका। ख्वाहिश लाशों में तब्दील हो गई। वह पूरी नहीं हो सकीं। गाड़ी खरीदने की वजह से पूरे परिवार का नाम राशन कार्ड से किसी ने कटवा दिया था। राशन कार्ड नहीं होने से प्रधानमंत्री आवास योजना से भी वंचित कर दिया गया था।
काजल बताती है,
दादी ने सुबह में करीब साढ़े चार बजे उसकी मोबाइल पर कई बार फोन किया था। वह सोई हुई थी उसे क्या पता था.. सोए रहने के कारण वह फोन नहीं उठा सकी। इसके बाद पति के मोबाइल पर फोन किया तो बात हुई। दादी ने हाल-चाल पूछने के बाद ठीक से रहने की बात कही। दोनों छोटे भाइयों ने भी बात की। बोले बउआ (भांजे) को ठीक से रखना। अभी हम बिस्किट खा रहे हैं।
पिता ने कहा, अब हम सभी घर छोड़कर जा रहे हैं। घर का ख्याल रखना। इतनी बात होने के बाद फोन कट गया। इसके बाद फोन बंद हो गया। मैंने कई बार फोन लगाया। करीब एक घंटे बाद ही घटना की जानकारी मुझे मिली। अब पुलिस को विसरा रिपोर्ट का इंतजार है। मौत का कारण जानना है। मनोज का परिवार आर्थिक रूप से साधन विहीन था, समूह और अन्यत्र जगहों से उसके उधारी लेने की बातें यह अब फाइलों में सिमट चुका है।
केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय मौके पर पहुंचे थे। घटना की जांच की बात कही है। अब इस घटना की जांच की जाएगी। मौत की वजह को सामने लाया जाएगा। जाप प्रमुख पप्पू यादव, तेजस्वी के भी अपने सवाल हैं? मगर, सच यही है, मौत को सबसे पहले गले लगाने वाले उस दादा की पीड़ा की पड़ताल पहले क्यों नहीं हुई? क्यों ना उसी मोड़ पर इस दर्द को यूं ही छोड़ दिया जाए…सच मानो तो मनोरंजन ठाकुर के साथ
जैसा दर्द हो वैसा मंज़र होता है,
मौसम तो इंसान के अंदर होता है।


