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फ़रवरी, 12, 2026
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ये कलियुग है ठगी की इन्तेहां होती नहीं कोई, सुना है हर दिन यहां दिल्ली का क़ुतुबमीनार बिकता है

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तेरे आदर्श तेरे मूल्य सारे बिक गए बापू, तेरा लोटा तेरा चश्मा तेरा घर-बार बिकता है। बड़े अफसर का सौदा हाँ भले लाखों में होता हो, सिपाही दस में और सौ में तो थानेदार बिकता है। वही मुंबई जहां टाटा अंबानी जैसे बसते हैं, वहीं पर जिस्म कईओं का सरे बाज़ार बिकता है। चुने जाते ही नेता सारे वादे भूल जाते हैं, यह वोटर किस छलावे में भला हर बार बिकता है। ये कलियुग है ठगी की इन्तेहां होती नहीं कोई सुना है नेट पर दिल्ली का क़ुतुब मीनार बिकता है। करप्शन इस कदर हावी शहर के अस्पतालों में दवा के वास्ते हर रोज़ ही बीमार बिकता है।

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शहर के हालात यह हैं, ऐसी भी अदालत है जो रूह परखती है, महदूद नहीं रहती वो सिर्फ़ बयानों तक, हर वक़्त फ़िज़ाओं में महसूर करोगे तुम, मैं प्यार की ख़ुशबू हूं, महकूंगा ज़मानों तक। अगर नवाज़ रहा है तो यूं नवाज़ मुझे, के’मेरे बाद मेरा ज़िक्र बार-बार चले। ये जिस्म क्या है कोई पैरहन उधार का है,यहीं संभाल के पहना, यहीं उतार चले। घर के बुज़ुर्ग लोगों की आंखें क्या बुझ गईं, अब रोशनी के नाम पर कुछ भी नहीं रहा।ये कलियुग है ठगी की इन्तेहां होती नहीं कोई, सुना है हर दिन यहां दिल्ली का क़ुतुबमीनार बिकता है

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