



देश से लेकर हर शहर तक कराहते स्वर हमें व्यथित कर रहे। सीमा पर जवान मर रहे। आतंकी हमले में बेवजह हमारे सपूत मारे जा रहे। सरकार बदला लेगी मगर कब। 1999 में कंधार कांड हुआ। तीन आतंकी को छोड़ा गया उस दौरान भी देश के सुरक्षा सलाहाकार डोभाल थे। आज भी डोभाल हैं। लगातार हमारे जवान शहीद होते जा रहे हैं मगर एक ही स्वर सुनाई पड़ता है खून खौलता है तो बदला लो। मगर आज तक हम खुद को बदल नहीं सके सार्थक बदला क्या लेंगे। हमारी मानसिकता कमजोर है। हमें सिर्फ एक रॉबर्ड वाड्रा एक लालू प्रसाद का परिवार ही पूरे देश में भ्रष्ट दिखता है कभी ईडी गांवों तक क्यों नहीं पहुंची कभी इनकम टैक्स का छापा गांवों में क्यों नहीं पड़ा। छोटे शहरों में क्यों नहीं हो रही कार्रवाई जहां रातों रात महल खड़े हो जा रहे हैं जिन्हें हालतक दो वक्त की रोटी नसीब नहीं थी आज स्कार्पियो पर कैसे घूम रहे।
भ्रष्टाचार का सीधा मतलब है आय से अधिक संपत्ति जरा आप सोचिए आपके पड़ोसी के पास इतना अकूत धन कहां से आया जहां साइकिल पर चढ़ नहीं सकने वाला शख्स आज गाड़ियों पर घूम रहा है झोपड़ी से निकलकर महलों में रहने लगा है। रातों रात मकान दर मकान बन रहे कहां से कौन ला रहा है कहां से ला रहा है कैसे ला रहा है किसी से कोई नहीं पूछता सिर्फ राजनीति की रोटी सेंकने के लिए अपना उल्लू सीधा करने के लिए सपूतों के बलिदानों के मौके पर भी वोट के लिए आशीर्वाद मांगते हमें आगे के कार्य करने हैं कि एवज में वोट मांगतें हमारे देश के हुकुमराम कितने शर्म से शर्मसार भी नहीं हैं हमें देखना होगा सोचना होगा। ऐसे में, पुलवामा हमले के शहीदों को हमारा नमन। देशज टाइम्स की एक पाठक दरभंगा से मनीषा झा ने हमें एक कविता भेजी है। दादा कहिन में दादा के आदेश पर प्रस्तुत है मनीषा की रचना…पुलवामा में शहीद हुए मेरी माटी के सपूतों को शत-शत नमन
सुनों सपूतों
सुनों सपूतों
जीत गए तुम
अपनी शहादत देकर
रखवाले वतन के सो गए
जान की कीमत देकर
जिसे न भाये
लाल मेंहंदी के रंग
क्षण भर जो बीता न सका
नन्ही किलकारी के संग
जो हर बार लौट जाता रहा
रोती मां को हिम्मत देकर
सुनों सपूतों जीत गए तुम
अपनी शहादत देकर
हम घरों की बालकोनी से
बारिश का लुत्फ़ उठाते रहे
तुम अपने लहू से सींचकर
असली प्रेम दिवस मनाते रहे
खुद को कैसे संभालेगी भारत मां
बेटों की ऐसी हालत देखकर
सुनों सपूतों जीत गए तुम
अपनी शहादत देकर
नकली दुराचारी शासक
चुप बैठे हैं गद्दी पर
असली सिपाही सीमा पर काबिज
फक्र है ऐसी वर्दी पर
देखकर राजनीति का खेल घिनौना
रोज हम मरते हैं
नमन तुमको ऐ शहीदों
आए थे अच्छी किस्मत लेकर



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