



बीमारी के कष्टदायक दिनों में, मन्थर हुआ समय,एक बार पुनः अपनी पूरी रफ़्तार से उड़न-छू होने लगता है, मन-बावरा ठगा ठिठका, उसे चुपचाप देखता,चला जाता है इस अहसास के साथ कि वह अपने वक़्त पर लाख चाहकर भी कोई नियन्त्रण नहीं रख सकता अच्छे और बुरे वक़्त को स्वीकार करने और उसके साथ चलते जाने के सिवा उसके पास कोई चारा नहीं है, कितना कुछ टूट्ने लगता है, शरीर और मन के अन्दर घर में और घर के बाहर जब घर का अकेला कमाऊ मुखिया बीमार पड़ता है वक़्त ठहर जाता है खिड़की और बरामदे से आकाश पूर्ववत दिखता है मगर गृहस्वामिनी के हृदय के ऊपर सूर्य-ग्रहण और चन्द्रग्रहण दोनों कुछ यूं छाया रहता है कि दिन मटमैला और उदास दिखता है और इस मन्थर गति से गुज़रता है मानों किसी अनहोनी के इन्तज़ार में रूका खड़ा हो रात निष्ठुर और अपशकुन से भरी बीते नहीं बीतती मानो शरीर में चढ़े विषैले साँप का ज़हर उतारे नहीं उतरता, बीमारी का निवास तो किसी व्यक्ति-विशेष, के शरीर में होता है मगर उसकी मनहूसियत पूरे घर पर छायी रहती है बच्चों की किलकारी से हरदम गूँजनेवाला घर
दमघोंटू खाँसी से भर जाता है गले की जिस रोबीली आवाज़ की मिसाल पूरा पड़ोस दिया करता था आज उसकी पूरी ताक़त आँत को उलटकर रख देने वाले वमन करने में लगी हुई है बीमारी एक चपल शरीर को चार बाई छह की चारपाई तक स्थावर कर देती है घर की पूरी दिनचर्या डॉक्टर की बमुश्किल समझ आनेवाली पर्ची और विभिन्न रंगों की दवाइयों के बीच झूलती रहती है
स्कूल से अधिक अस्पताल की और पढ़ाई से अधिक स्वास्थ्य की चर्चा होने लगती है बुखार में तपते शरीर की ऐंठन कुछ यूँ मरोड़ देती है कि मन में कहीं गहरे जमी अकड़ जाने कहाँ हवा हो जाती है बीमारी शरीर को दुःख देती है और अपने तईं मन को विरेचित भी करती है छोटे और सुखी परिवार की आदर्शवादी संकल्पना की आड़ में जीते मनुष्य को सहसा अपनापरिवारकाफ़ी छोटा लगने लगता है बच्चों को हरदम अपनी छाती से चिपटाए रखने वाले दयालु पिता के कन्धे जब झुकने और चटकने लगते हैं तब हमेशा सातवें आसमान पर रहने वाला उसका गर्वोन्मत्त पारा एक झटके में यूं गिरता है कि वह बीमारी के बाद शरीर और सम्बन्ध दोनों कुछ नए रूप में निखरकर सामने आता है।



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