



क्यूं तुम हमें , हर रोज़ ही , कहते हो खबरदार ,जब तुम ही , करते हो यहां, लाशों का व्यापार। हक़ छीने , आशा है छीनी , किया जीना दुश्वार , कहते हो , सब्र करो , जब चुभन हो रही अपार ! क्या ये , वो राज धर्म है, जिससे चलती सरकार,सत्ता में , अंधों की जैसे , हो गयी है भरमार !!माता पिता ने पढ़ा लिखाकर , तुमको अफसर बना दिया..आज देखकर लगता है की , सबसे बड़ा एक गुनाह किया..रिश्वत लेने से अच्छा था , भिक्षा लेकर जी लेते.. मुंह खोलकर मांगे पैसे , बेहतर होंठ तुम सी लेते..! ऐसे में, जुर्म, बेइमानी,ठगी,घूसखोरी का यह जमाना जाएगा ,स्वतंत्र भारत का सपना गांधी का फिर से आएगा।
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