



मानवता हो पंगु जब, करे कौन आचार। नैतिकता हो सुप्त जब, जागे भ्रष्टाचार। प्रथा कमीशन घूस है, छूट करे सरकार। नैतिकता के पाठ का, है ज्यादा दरकार। जनता नेता भ्रष्ट है, भ्रष्ट लगे सब तंत्र। नेत्रहीन कानून है, दिखे कहां षडयंत्र। अपने समाज देश का, करो व्याधि पहचान। जनक व्याधि के आप ही, आपहि वैद्य महान। रिश्वत देना रोग है, रिश्वत लेना रोग। जीना दुष्कर जो करे, बनकर पामर योग। चूसे भ्रष्टाचार अब, खटमल जैसे खून। देश, राज्य बेहाल है, छोड़ो आप जुनून। हल्ला भ्रष्टाचार का, करते हैं सब कोय। जो बदलें निज आचरण, हल्ला काहे होय। घुसखोरी के तेज से, तड़प रहे सब लोग। रक्तबीज के रक्त ये, देते रहते रोग। नीलाम देश को कर दे ये, जो इनका बस चल जाए। भारत मां को कर शर्मिंदा, ये उसकी कोख लजाए. इस देश की है बीमारी, ये दानव अत्याचारी.खून चूसकर जनता का, ये अपना राज चलाए जो खाली रह गया इनका पेट, नरभक्षी भी बन जाए. इस देश की है बीमारी, देखो इनकी गद्दारी. गाय का चारा खाते ये, कोयले की कालिख लगाते ये, धरती माँ का सौदा कर, उसको भी नोच खाते ये. इस देश की है बीमारी, ये भूखे भ्रष्टाचारी।




You must be logged in to post a comment.