



यह कैसा है घोटाला, कि चाबी मे है ताला,कमरे के अंदर घर है और गाय में है गोशाला। दातों के अंदर मुंह है, और सब्जी में है थाली, रूई के अंदर तकिया,और चाय के अंदर प्याली। टोपी के ऊपर सर है। और कार के ऊपर रस्ता, ऐनक पे लगी हैं आंखें, कापी किताब में बस्ता। सर के बल सभी खड़े हैं, पैरों से सूंध रहे हैं, घुटनों में भूख लगी है और टखने ऊंघ रहे हैं। मकड़ी में भागे जाला,कीचड़ में बहता नाला, कुछ भी न समझ में आए यह कैसा है घोटाला। पैरों पे खड़े हो जाएं और नाक से खुशबू सूंघें, भर पेट उड़ाये खाना,और आंख मूंद के ऊंघे। जाले में मकड़ी भागे, कीचड़ नाले में बहता,अब सब समझ में आए कुछ घोटाला ना रहता। हालात यही है,सीख रहा हूँ मै भी अब मीठा झूठ बोलने का हुनर,कड़वे सच ने हमसे, ना जाने, कितने अज़ीज़ छीन लिए। शहर में लोग हर दिन दिन रात मुसीबतों के दौर में है और हुक्मरान ऐश में है। दादा कहिन, कुछ यूं हुआ कि.जब भी जरुरत पड़ी मुझे,हर शख्स इतेफाक से.मजबूर हो गया !!



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