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फ़रवरी, 12, 2026
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कौन करे रखवाली,बेसुध खेवनहार है,घिरी निराशा,नाव फंसी मझधार है,निजी शिक्षा में बस हाहाकार है

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देशज टाइम्स | Highlights -

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भारत के संविधान में नीति निर्देशक तत्वों में सरकार को यह निर्देश दिया गया था कि वह 14 वर्ष तक के सारे बच्चों के लिए मुफ्त शिक्षा देने की व्यवस्था 26 जनवरी 1960 तक करेगी। यदि इस तारीख के लगभग 50 वर्ष बीतने के बाद भी यह काम नहीं हो पाया है, तो उसके कारणों को खोजना होगा। क्या प्रस्तावित विधेयक उन कारणों को दूर करता है ? यही इस विधेयक को जांचने की मुख्य कसौटी होनी चाहिए।

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इच्छा शक्ति की कमी

सरकारों की ओर से अपने दायित्व-निर्वाह में इस चूक के लिए प्रमुख दलील दी जाती रही है कि भारत एक गरीब देश है और सरकार के पास संसाधनों की कमी रही है। किन्तु इस दलील को स्वीकार नहीं किया जा सकता। वे ही सरकारें फौज, हथियारों, हवाई अड्डों एवं हवाई जहाजों, फ्लाई-ओवरों, एशियाड और अब राष्ट्रमंडल खेलों पर विशाल खर्च कर रही है। दरअसल सवाल प्राथमिकता और राजनीतिक इच्छाशक्ति का है। देश के सारे बच्चों को शिक्षित करना कभी भी सरकार की प्राथमिकता में नही रहा है। यह भी माना जा सकता है कि भारत का शासक वर्ग नहीं चाहता था कि देश के सारे बच्चे भलीभांति शि्क्षित हों, क्योंकि वे शि्क्षित होकर बड़े लोगों के बच्चों से प्रतिस्पर्धा करने लगेगें और उनके एकाधिकार एवं विशेषाधिकारों को चुनौती मिलने लगेगी। अंग्रेजों के चले जाने के बाद अंग्रेजी का वर्चस्व भी इसीलिए बरकरार रखा गया।
देश के सारे बच्चों को शि्क्षित करने का काम कभी भी निजी स्कूलों के दम पर नहीं हो सकता। कारण साफ है। देश की जनता के एक हिस्से में निजी स्कूलों की फीस अदा करने की हैसियत नहीं है। भारत की सरकारों को ही इसकी जिम्मेदारी लेनी पड़ेगी और सरकारी शिक्षा व्यवस्था को ही व्यापक, सुदृढ़ व सक्षम बनाना होगा। लेकिन पिछले दो दशकों में सरकारें ठीक उल्टी दिशा में चलती दिखाई देती है। यानि अपनी जिम्मेदारी से मुंह मोड़ना, सरकारी शिक्षा व्यवस्था को जानबूझकर बिगाड़ना एवं वंचित करना तथा शिक्षा के निजीकरण एवं व्यवसायीकरण को बढ़ावा देना। इससे भी मालूम होता है कि सरकार की इच्छा इस दिशा में नहीं है। हालात यही है, निजी शिक्षा का संस्थान है ये, छात्र यहां पे आते हैं। विद्या के सागर में लोट-पोट कर, डुबकी यहां लगाते हैं। संस्कारों से भरा-पूरा है, गुरुजन यहां के श्रेष्ठ। शिक्षा ग्रहण शिष्य सब करते, होकर बड़े सचेत। कोई अफसर कोई वैज्ञानिक, इंजीनियर बन नाम कमाते हैं। विद्या के सागर में लोट-पोट कर, डुबकी यहां लगाते हैं। अनुशासन में रहकर पढ़ते,अपनाते हैं ज्ञान। होनहार बन जाते हैं, मिलता है सम्मान। लैला-मजनूं जो बनकर घूमे, जीवनभर पछताते हैं। विद्या के सागर में लोट-पोट कर, डुबकी यहां लगाते हैं। मगर, देखकर तब हैरानी होती है जब हमारे बीच सरकारी व्यवस्था से बेहतरी का दावा करने वाली निजी स्कूली संस्थान में अभिभावकों के खून चूसने की परंपरा ने आज संपूर्ण शिक्षा व्यवस्था को आगोश में ले रखा है। बुझने लगी हो आंखे तेरी, चाहे थमती हो रफ़्तार, उखड़ रही हो सांसे तेरी, दिल करता हो चित्कार, दोष विधाता को ना देना, मन में रखना तू ये आस, ‘रण विजयी’ बनता वही, जिसके पास हो ‘आत्मविश्वास’क्या सोचा था पर देखो क्या हो रहा, । तूफानों का ज़ोर, किनारा दूर है, चूर नशे में, बेसुध खेवनहार है।कौन करे रखवाली,बेसुध खेवनहार है,घिरी निराशा,नाव फंसी मझधार है,निजी शिक्षा में बस हाहाकार है

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