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अब वैसी बात नहीं दिखती…साहेब! सिस्टम ही बदल गया…Sanjay Kumar Roy के साथ

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पूरे बिहार में बेहतर पुलिसिंग का ढिंढोरा खूब पीटा जा रहा है। पुलिस विभाग के मुखिया अलग-अलग समयों में जिलों का दौरा कर अपने अधीनस्थ काम कर रहे सिपाही से लेकर जिले के कप्तान तक का हौसला अफ़जाही कर रहे हैं।

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उन्हीं की तर्ज पर जब आईजी बैठक करते हैं या फिर किसी थाना का निरीक्षण करते हैं तो वही पाठ कमोवेश पढ़ाते हैं। थाना स्तर से लेकर अनुमंडल स्तर तक सभी पुलिस वाले गदगद। अब उनके गुणगान में सभी पुलिस वाले गीत गाने लगते हैं। लेकिन, इसका प्रतिफल ठीक उसके विपरीत होता है।

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कुछ साल पहले तक देखते थे, एसएसपी साढ़े दस या ग्यारह बजे तक ऑफिस में बैठ जाते थे। इस दौरान आए फरियादियों से मुलाकात करते थे। उनकी बातें सुनते थे। फिर आदेश निर्देश देते थे। इस दौरान कई बड़ी बातें भी एसएसपी के समक्ष आती थी। एसएसपी उस पर कार्रवाई करते थे। थानेदार निलंबित भी होते थे। यहां तक कि डीएसपी स्तर तक भी कार्रवाई होती थी। जब उनकी भी गलती पकड़ी जाती थी।

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गंभीर मामलों में एसएसपी खुद घटना स्थल का निरीक्षण करते थे। जो अब दिखाई नहीं पड़ता। अब प्रक्षेत्र को सरकार ने रेंज में बदल दिया है। इस कारण पुलिसिंग में बहुत गिरावट आयी है। अब दरभंगा की ही बात लें तो यहां से डीआईजी का पद हटा दिया गया।

पहले आईजी और डीआईजी के रहने से सभी पुलिसकर्मी डरे-सहमे रहते थे। कोई भी गलती करेंगे तो एसएसपी के अलावे डीआईजी-आईजी हैं जो कारवाई कर सकते हैं। अब वैसी बात नहीं रही। अब अपने-अपने तरीके से बस सिस्टम को चलाने की कोशिश करते हैं। अब एक थानेदार को एसपी से डर नहीं लगता। आईजी से भी डर नहीं लगता। क्योंकि यह पुलिस विभाग का एक प्रगाढ़ सिस्टम बन गया है। जहां आप मनमौजी कर सकते हैं।

हां, आम पब्लिक के बीच छवि कायम रखने के लिए बैंठकें, थानों की समीक्षा, आदेश निर्देश चलते रहते हैं। लेकिन वास्तव में आम पब्लिक के बीच जो पुलिस से परेशानी है। वह थाना पर बैठने के बाद पता चलेगा। पता चलेगा कि किसी घटना के बाद जब आम आदमी अपनी शिकायत को लेकर थाने पहुंचता है। अगर पुलिस के कोई आलाधिकारी सेवानिवृत हो जाएं और उनके घर में कोई बड़ी घटना घट जाए और अब के समय में थाना पहुंचकर एफआईआर कराने की कोशिश करें तब उन्हें पता चल जाएगा।

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किसी भी थानेदार की ओर से प्राथमिकी दर्ज नहीं करना ही अपराध है। और, ऐसा अपराध प्रत्येक दिन राज्य के सभी थानों में होता है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश की धज्जियां उड़ाई जाती है। एक दशक पहले भी जिला में एसपी हुआ करते थे। सिर्फ प्राथमिकी दर्ज नहीं करने वाले थानेदारो पर कार्रवाई करते थे। यहां तक कि निलंबित कर देते थे।

थाना डीएसपी, एसएसपी, डीआईजी, आईजी का जनता दरबार होता था। लोगों को न्याय मिलती थी। अभी भी वहीं जनता दरबार लगता है, लेकिन दर्जनों बार एक पदाधिकारी के पास जाना पड़ता है। न्याय उन्हें मिलता नहीं। जब वरीय पदाधिकारियों से लोग शिकायत करते हैं और बार-बार करते हैं, फिर भी उन्हें उसी पदाधिकारी के पास भेज दिया जाता है।

लोग निराश-हताश होकर घर बैठ जाते हैं। मनोबल पुलिस का बढ़ना चाहिए पर न्याय देने के लिए अन्याय करने के लिए नहीं। पुलिस के प्रति लोंगों का बढ़ता अविश्वास का प्रतिफल है कि कई जगह पुलिस को मुंह की खानी पड़ती है। और, पूरा विभाग बदनाम होता है।

आईजी ललन मोहन प्रसाद कहते हैं, छोटी-मोटी बातों में प्राथमिकी दर्ज करने का औचित्य नहीं है। कई थानेदार और वरीय पुलिस पदाधिकारी तो ऐसे हैं कि सरकारी नंबर पर आप फोन करेंगे तो उठाएंगे नहीं। इसमें भी पुलिस ने तरक्की की है? अगर आपसे परिचय है और उनका निजी नंबर है, फिर क्या है, बात हो जाएगी। लेकिन, कोई पीड़ित व्यक्ति घटना के वक्त थाना के सरकारी नंबर पर फोन किया तो उनका फोन नहीं उठेगा।

कुछ ही थानेदार फोन उठाते हैं। पांच साल पहले ऐसा नहीं होता था? अगर कोई थानेदार के नंबर पर फोन किया और वह किसी काम में या बैठक में व्यस्त है तो मिस्ड कॉल देखकर रिंग करते थे। ऐसे थानेदार ही नहीं एसएसपी भी करते थे। सरकार जितनी हाइटेक पुलिस को बना रही है, उतना बेहतर प्रदर्शन पुलिस वाले नहीं कर रहे हैं।

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एक दशक पहले अपराध नहीं हो उसके लिए पुलिस पुलिसिंग में जी-जान लगा देती थी। नेटवर्क मजबूत करती थी, ताकि घटना से पूर्व अपराधी पुलिस के हत्थे चढ़ जाएं, लेकिन अब अपराध के बाद अनुसंधान और गिरफ्तारी की बात होती है। कई डीजी और एडीजी स्तर के पदाधिकारी भी इस बात को स्वीकारते हैं कि पुलिसिंग में बहुत गिरावट हुई है। जब कांड ही कम दर्ज होंगे तो निष्पादन करने में कितना वक्त लगेगा! फिर यह आंकड़ा सरकार के पास पहुंचता है। और, सरकार भी कहती है कि अब बिहार में अपराध नहीं है।

आज भी पुलिस चाहे तो बढ़ रहे अपराध में कमी ला सकती है। क्योंकि पुलिस का खुद तंत्र मजबूत है। ग्रामीण क्षेत्रों में चौकीदार है। दफेदार हैं। फिर थाने में हवलदार, एएसआइ, एसआइ, थानाध्यक्ष, इंस्पेक्टर, डीएसपी, एसपी, फिर कई जिलों में एसएसपी हैं।

अगर एक-दूसरे की कमियों पर ध्यान देकर गलती करने वालों पर कागजी घोड़ा दौड़ाया जाए तो आज भी बेहतर पुलिसिंग की कल्पना की जा सकती है। सबसे बड़ा नेटवर्क तो पुलिस का पत्रकार है, लेकिन अब पुलिस पत्रकारों से भी दूरी बनाकर चलती है। बस अपनी उपलब्धि बताने के लिए लोगों तक उनकी बात बताने के लिए पत्रकार हैं!

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