



जल ही जीवन जल सा जीवन,जल्दी ही जल जाओगे,अगर न बची जल की बूंदें, कैसे प्यास बुझाओगे। नाती-पोते खड़े रहेंगे जल, राशन की कतारों में, पानी पर से बिछेंगी लाशें, लाखों और हजारों में। रिश्ते-नाते पीछे होंगे, जल की होगी मारामारी, रुपयों में भी जल न मिलेगा, जल की होगी पहरेदारी। हनन करेंगे शक्तिशाली, नदियों के अधिकारों का, सारे जल पर कब्जा होगा, बाहुबली मक्कारों का।
जी हां, सर्द मौसम में भी शहरवासी एक एक बूंद पानी को तरसते दिखे हैं अभी जेठ का महीना आना बाकी है। धनाढ्य लोगों ने समरसेवुल लगा लिया और गरीब सरकारी दलालों के हाथों एक बूंद पानी को तरस रहे हैं। जहां-जहां सरकारी चापाकल लगे भी हैं बूंद बूंद पानी देने को तैयार नहीं। हालात अभी से इतने बदतर दिख रहे कि भविष्य में अगर जंग पानी के लिए ही ना अभी से छिड़ जाए संभावनाएं बनती दिख रही है। सबसे बदतर हालत गरीबों की है जिनके पास ना तो वॉसर बदलने के पैसे हैं ना समरसेवुल लगाने की औकात। हालात इतनी बदसूरत होती अभी से दिखती है कि एक बूंद भी पानी कहीं दिखे तो सुकून आ जाए। ऐसे में प्रशासन, सरकारी व्यवस्था को लताड़ लगाते दादा कहिन, किसने भीगे हुए बालों से ये झटका पानी है, ऐसी प्यास और ऐसा सब्र दरिया पानी पानी है।



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