



एक शादी में एक वरिष्ठ पत्रकार दिल्ली से अर्से बाद दरभंगा आए। स्टेशन पर उतरकर सीधे दरभंगा टावर के एक नामचीन होटल पहुंचने के लिए रिक्शा किया। पहले तो रिक्शा भाड़ा सुनकर दंग रह गए बाद में मुझसे कहा, यार ये शहर मैंने जैसा सोचा उसके विपरीत निकला। बहुत गंदगी है यहां, कहा कि जब मैं स्टेशन से निकला देखा, सिगरेट और अगरबत्ती के खाली पैकेटों के बीच जोरदार झगड़ा हो रहा है। दोनों एक दूसरे पर बदबू फैलाने का आरोप लगा रहे हैं। आगे बढ़ा तो देखा, पेप्सी की खाली बोतल के बगल में लेटी है, सरसों के तेल की खाली बोतल। दो सौ मिलीलीटर आयतन वाली शीतल पेय की खाली बोतल के ऊपर लेटी है, पानी की एक लीटर की खाली बोतल। दो मिनट में बनने वाले नूडल्स के ढेर सारे खाली पैकेट बिखरे पड़े हैं। उनके बीच बीच में से झांक रहे हैं सब्जियों और फलों के छिलके हैं। डर से कांपते हुए चाकलेट और टाफ़ियों के तुड़े मुड़े रैपर, हवा के झोंके के सहारे भागकर कचरे से मुक्ति पाने की कोशिश कर रहे हैं।
उन्होंने कहा, यहां आकर पता चलता है कि सरकार की तमाम कोशिशों और कानूनों के बावजूद धड़ल्ले से इस्तेमाल हो रही हैं पॉलीथीन की थैलियां, एक गाय जूठन के साथ साथ पॉलीथीन की थैलियां भी खा रही हैं एक आवारा कुत्ता बकरे की हड्डियाँ चबा रहा है। वो नहीं जानता कि जिसे वो हड्डियों का स्वाद समझ रहा है, वो दर’असल उसके अपने मसूड़े से रिस रहे खून का स्वाद है। वरिष्ठ पत्रकार ने हमसें कहा, कुछ मैले-कुचैले नर कंकाल कचरे में अपना जीवन खोज रहे थे। पास से गुज़रने वाली सड़क पर आम आदमी जल्द से जल्द इस जगह से दूर भाग जाने की कोशिश रहे थे, क्योंकि कचरे से आने वाली बदबू उसके बर्दाश्त के बाहर है। ये विकास का कचरा है, या कचरे का विकास है…यही हमरा शहर है…



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