



वर्षों से नगर में आवारा पशुओं की भरमार व उनके आतंक के कारण शहरवासियों को तरह–तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।आए दिन बाजार क्षेत्र में दुकानदारों को आर्थिक नुकसान भी उठाना पड़ता है। इस संबंध में स्थानीय प्रशासन से लेकर निगम सबकुछ देखते हुए भी अनदेखी कर रहा है। बाजार क्षेत्र सहित सकरी गलियों में गायों व आवारा पशुओं का निरंकुश होकर घूमना लोगों के लिए परेशानी का सबब बना हुआ है। इनके आपस में झगड़ने के कारण कई बुजुर्ग–महिलाएं व बच्चे भी इनकी चपेट में आने के कारण चोटिल हो जाते हैं। कभी–कभार तो छोटे स्कूली बच्चे इन आवारा पशुओं के आपसी झगड़े को देख काफी भयभीत हो जाते हैं। उधर अक्सर खाद्य व सब्जी की दुकानों पर भी यह अपना मुंह मारते रहते हैं। दुकानदारों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है। हर जगह कचरा जमा रहने से वहां आवारा मवेशियों का जमघट लगा रहता है। भयावह स्थिति तब बन जाती है, जब ये आवारा मवेशी मार्गों के किनारे लगे कचरे के ढेरों पर आपस में झगड़ते हैं। कई बार तो बाजार क्षेत्र में भी इनके आपस में झगड़ने से यातायात बाधित होता है।
उधर, स्थानीय प्रशासन आवारा पशुओं के नकेल कसने की दिशा में कोई भी प्रयास नहीं कर रहा है। शहर के हालात यूं हैं कि, ज़िंदगी जानवर की बदहाल है, पूछता खुद–ब–खुद में सवाल है। आदमी क्यूं बदल रहा चाल–ढाल है, जगह जानवर की लेने को तैयार है।पहले तो मिल जाती थी जूठन या रोटी दो, अब आदमी चाहता है बस इनकी बोटी हो। फिरते है य़े आवारा कुत्ते बिल्लियां, विभिन्न जाति के य़े मवेशियां, भूख इनकी भी होती है तीव्र, पर समझता नहीं इन्हें कोई जीव, अब तो जूठन भी भाग में न आए, भले अन्न निर्जीव डिब्बों में डाल दिए जाए, मासूम य़े भी हैं कौन य़े समझाए, आदमी हो आमदनी, सबसे वफादारी निभाए, चिंतित है अब पशु समाज कैसे य़े बताए, आदमी को आखिर कैसे दें राय। मुश्किल है मलाल है, न बोलने से हलाल है, बस निकले दम रोज और बिखरे खाल हैं।




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