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फ़रवरी, 11, 2026
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बहती गंगा…फिर…कोऊ नृप होय हमें का हानि…सच मानो तो मनोरंजन ठाकुर के साथ

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सचमुच देश तरक्की कर रहा है। सरकारें तरक्की कर रही हैं। दल के बूते नई सरकारें बदल रही हैं। देश इस वजह  परेशान है, भारत-पाकिस्तान के बीच महा संडे मुकाबले में भारत की जीत के बाद भी कोई तिरंगा हाथ में नहीं लेना चाहता। सत्ताधारी पक्ष की अपनी ताकत है। वह सत्ताधारी हैं। ध्वज उठाएं, लहराएं या बार-बार झटक देें, उनकी मर्जी।

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विपक्ष है ना, उसके पास सिर्फ तख्ती है। इसे दिखाकर भड़ास में वह सरकार का कुछ भी बिगाड़, उसका शक्ल बदरंग करने की हिम्मत भी नहीं जुटा पाती। क्योंकि, जनता उसी तिरंगे को लेकर पागल है, जिसे उसने अपने घरों से अभी-अभी उतारा है, सहेजकर रखा है, उसे अमृत माना है।

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मगर, जनता, भावुकता में है। जनता के पास कुछ सोचने और समझने की शक्ति नहीं है। अंधभक्ति में जो दिखाया, चकाचौंध में परोसा, समझाया जाता है वही उसे स्वीकार्य है। कभी जात में बंट जाना। कभी धर्म के बहाने उलझ जाना।

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साबरमती के किनारे तीन दिनों पहले शनिवार को साढ़े सात हजार लोगों ने एक साथ चरखा काते। यह एक रिकॉर्ड भी बना। यह खादी उत्सव का हिस्सा था। मगर, तेरे शहर का मौसम क्या है? कितने लोग खादी का हिस्सा बनते हैं या खादी माॅल टहलने भी जाते हैं। या फिर, आपके यहां कितने खादी सेंटर हैं। उसकी हकीकत क्या है। उसमें क्या-क्या मिलता है। क्या आपके लिए उस खादी की जरूरी है, जिसे वहां से आप घरों तक आविष्कारित तरीके से लाएं।

राष्ट्रपिता के हाथ में जिस धागे और सुतली के साथ लकड़ी का यंत्र दिखता है, वही उन सभी पर प्रभावी है। जरूरत के हिसाब से स्वयं गांधी ने पहल कर चरखे में सुधार कराए थे। यरवदा जेल और आगा खां पैसेल में कैद के दौरान उन्होंने कारीगरों की मदद से यह किया। फिर साबरमती आश्रम में बापू के साथ रहे मगनलाल गांधी ने भी इस सुधार को आगे बढ़ाया था। मगर, आज कारीगर किस पॉजिशन में हैं। किस आत्मविश्वास से भरे हैं। उनकी जरूरत क्या है। उनके भरण-पोषण की चिंता कौन कर रहा…वगैरह…वगैरह हाशिए पर है। आप सवाल पूछ ही नहीं सकते?

देश की सड़कों पर लावारिस पशुओं का जमघट है। इनके साथ भिड़कर, हादसों में इंसानी मौतें गंभीर चिंता है। ऐसा कोई हाइवे बचा ही नहीं, जहां खून न बहता हो। दुर्भाग्य यह, अधिकांश राज्य सरकारों के पास इन हादसों को रोकने और लावारिस पशुओं को आश्रय देने की कोई ठोस योजना नहीं है। उन्हें यह भी फुर्सत नहीं, इस ओर पहल करें। सड़कों पर पशुओं की वजह से होने वाली इन अप्राकृतिक मौतों को रोकें। सरकारें निश्चंत हैं। और, देश आजादी के अमृतकाल से बाहर निकल रहा है। बड़े से छोटे शहरों में ऐसी छोटी-छोटी बातें हो रहीं हैं। सरकारें चल रहीं हैं…मजे मा।

हाल, कमोबेश उस महाभारत काल सा दिख रहा, जहां युधिष्ठिर व्यथित हैं। युधिष्ठिर अर्जुन से कहे रहे हैं,पृथ्वी के लिए हमने बंधु-बांधवों का वध कर बड़ा पाप किया है। इस पाप से हम नरक जाएंगे। यह राज्य और भोग मुझे नहीं चाहिए। अर्जुन बोले, कैसा दुख है? जिसके कारण धर्म से प्राप्त पृथ्वी को त्याग कर वन जाने की बात सोची जाती है। राज्य और संपदा युद्ध से मिले थे। पृथ्वी धर्म से प्राप्त हुई थी। यहां युद्ध और धर्म एक हो गए हैं। धर्म और अर्थ का त्याग करके वन प्रस्थान मूढ़ता है। ‘दरिद्रता बड़ा पाप है। सब क्रियाएं धन से होती हैं। अर्थ के बिना प्राण यात्रा सिद्ध नहीं होती। धर्म, काम और स्वर्ग सब अर्थ से ही होते हैं।

सही कहा था अर्जुन ने, राजनीति भी उसी दरिद्रता से चल रही, जहां रेबड़ी क्लचर के आगे सब बौने बने बैठे हैं। दुहाई यह, गरीब मर रहे। देश में गरीबी है। मगर, पूछे कोई कहां हैं गरीब, किस समाज में हैं औचित्यपूर्ण गरीब, किसे मिल रहा फ्री का निबाला, क्या वह उसके लिए सही मायने में जरूरत है।, क्या वह गरीब उसका सही मायने में हकदार है। गरीबों का सर्वेक्षण कितने साल पहले हुआ। आज सरकारें ऐसे गरीबों की बाइक और घरों की पड़ताल क्यों कर रही, क्या उसे भी शक है, गरीबी सचमुच नहीं है। अगर है, उसे पर्दे के पीछे नहीं, आगे लाने की जरूरत है। समाज के बीच उसे रखना है, उसका निदान करना है। ना कि मुफ्त की रेबड़ी बांटकर देश को कमजोरी की हालत में छोड़वश देना है।

इजरायल से 500 करोड़ रुपए में खरीदे गए पेगासस जासूसी यंत्र की जांच में कुछ भी नहीं मिला। और, टेलीग्राफ ने जो कुछ छापा, उसे पूरी दुनिया ने देखा। उसकी खबर से अधिक उसकी तस्वीर चर्चा में आई। जहां, मुंह पर टेप और 56 इंच के स्टीकर ने सबको चौंकाया।

साथ ही, यह मान भी कराया, आज भी पत्रकारिता जिंदा है। पत्रकारिता को खत्म करने की कोशिश के मंसूबों पर उस कालिख के दाग जरूर हैं, जिसको लेकर पूरे देश में हाय-तौबा है। न्यूयार्क टाइम्स की विश्वसनीयता पर उस देश के लोग उंगुली उठा रहे, जहां पत्रकारिता बिकती है, उसके खरीददार हैं, लेकिन जहां पत्रकारिता पेगा…सस शीर्षक के साथ सबकुछ सामने रख दे, समझना चाहिए, पत्रकारिता कभी बिकती नहीं। हां, इसे खरीदने की कोशिश जरूर होती है, जैसा एनटीवी के साथ हुआ या हो रहा है।

अमृत-महोत्सव पर गुलामी की मानसिकता से मुक्त होने का आह्वान हुआ। यह स्मरण भर है, देश की आजादी अधूरी है। हम आज भी मानसिक रूप से गुलाम हैं। हम पूरी तरह स्वाधीन नहीं हो सके हैं। ऐसे में, तय मान लिया जाए कि पराधीनता के बंधन में दास स्वामी की दृष्टि से जैसे स्वयं को और अपनी दुनिया को देखने का अभ्यस्त हो जाता है। ठीक वैसा ही इस आवरण, अभ्यास में आने के बाद हम इस बात के भी आदी हो जाते हैं कि हमारी भावना, विचार और कर्म सभी उसी व्यवस्था से जुड़ी, उसी से अनुबंधित हैं। यानि सरकार जो कहे वही सही, उसकी तीव्रता, उसकी मारकता, उसका दोष-अवगुण का अहसास ही खत्म हो जाता है। और, तब दासता सिर्फ दासता ही शेष रह जाती है।

ऐसा होना चाहिए कि नहीं…जनता कहती है होना चाहिए, ऐसा नहीं ना होना चाहिए…हाथ उठाइए और जनता हाथ उठा देती है। यानि स्वीकारत्व भाव में हम जिंदा हैं। हमें सिर्फ स्वीकार करने के लिए ही जिंदा रहना है। हम स्वीकारत्व भाव में हैं। हमें सिर्फ हाथ उठाना है। हम हाथ उठाने के लिए ही जिंदा हैं।

ऐसे में, देश की पहचान, उसका स्वरूप एक विचारणीय प्रश्न के रूप में उभरता है। निश्चय ही, देश की विविधता और बहुलता हमारी उल्लेखनीय विशेषता है। इसकी संरचना और स्वभाव की दृष्टि से ही हम राष्ट्र राज्य (नेशन स्टेट) के विचार के साथ सभ्यतामूलक देश की अवधारणा की ओर अधिक उन्मुख हैं। इसी से देश के प्राचीन काल से हम परिचित हैं। यहां का लोकमानस इसी तरीके काम भी करता है। हमारी धरती  उपजे और पनपे विचारों में लोक, जन और सर्व जैसे विचार बड़े पुराने प्रतीत होते हैं। उसी की अभिव्यक्ति है, आज भी ‘हम’ शब्द का ‘मैं’ के अर्थ व्यक्त करते सामूहिक और क्षेत्रीय पहचान के बीच द्वंद्व की लड़ाई है।

केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर के लाखों गैर कश्मीरियों को अमृत महोत्सव का अनमोल तोहफा दिया। अनुच्छेद 370 और 35ए की विदाई के बाद लोकतांत्रिक तौर पर बड़ा क्रांतिकारी बदलाव हो रहा है।परिसीमन के बाद गैर कश्मीरियों को वोटिंग का हक मिलने जा रहा है। नए वोटर्स लिस्टेड होने के बाद घाटी में तकरीबन 25 लाख मतदाताओं का इजाफा हो जाएगा। मौजूदा वोटर्स में करीब एक तिहाई मतदाता और बढ़ जाएंगे। वोटर्स का यह आंकड़ा करीब एक करोड़ या इससे से अधिक हो जाएगा। नए चुनाव के बाद केंद्र शासित सूबे की सियासी तस्वीर बिल्कुल बदल जाएगी। यह मान लेते हैं। हालांकि, अभी इसमें भी प्रमुख दलों के नेताओं की हिस्सेदारी तय होनी है। ठीक वैसे ही, जैसे फारूख अब्दुल्ला टीवी पर सीधे साक्षात्कार के दौरान कश्मीरी पंडितों के सवाल पर कान से इयर फोन हटाकर अपनी कुर्सी से सीधा उठते हैं, और बीच साक्षात्कार से उठकर सीधा क्रोधित होकर चले जाते हैं, यह कहते, हमें यह इंटरव्यूह नहीं देनी।

बोरवेल में बच्चों के गिरने की बढ़ती घटनाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने 2010 में संज्ञान लेते हुए कुछ दिशा-निर्देश जारी किए थे। बावजूद ऐसे हादसे नहीं रुक पा रहे। इन दिशा-निर्देशों की अनदेखी बड़े सवाल खड़ा करती है।10 जून को छत्तीसगढ़ के जांजगीर-चांपा जिले में ऐसा ही हुआ। 80 फीट गहरे बोरवेल में गिरे 11 साल के राहुल साहू को आखिरकार 104 घंटे बाद सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया। इस रेस्क्यू ऑपरेशन में सेना, एनडीआरएफ, एसडीआरएफ, पुलिस, जिला प्रशासन, स्वास्थ्य, बिजली विभाग सहित कुल 500 लोगों की टीम जुटी। बोर के समानांतर गड्ढा खोदकर 20 फीट सुरंग बनाकर बच्चे का रेस्क्यू किया गया।

मगर, सवाल जो अब उस बिहार सरकार से है जो अभी-अभी बदली है। नई है। बिल्कुल ताजा। नए गुलाब सी पंखुड़ियों में लिपटी। खूशबू इस बात की, कि ज्यादातर मंत्री कहीं ना कहीं दल-दल में हैं। कीचड़ से निकलकर इसका सवाल सीधा कमल ने ही दागा है। वही कमल, जो आज से बामुश्किल कुछ दिन पूर्व तक सरकार का हिस्सा थी। आज, अनायास, अनकही बातें सुना रही। नीतीश बाबू ने कह दिया, सरकार गिरा दीजिए। कमल ने कहा था, तेजस्वी जब चाहेंगे सीएम बन जाएंगें। नीतीश बाबू की जदयू कह रही है, वैद्य का बेटा चाय वाले के बेटे को टक्कर देगा। सर्वे हो रहे। अगला पीएम कौन? कौन कितनी पानी में? सब रेस में हैं। लालू प्रसाद का एक पुराना वीडियो वायरल हो रहा है। गडकरी के पुराने किस्से सार्वजनिक हो रहे।

खैर, यह सब तो इस देश में होगा ही। मगर, सिस्टम कैसे सुधरेगा, इसपर कोई जवाब-सवाल कहां करने को तैयार। ताजा मामला जो आज का है। सुबह का है। यह अंग प्रदेश भागलपुर से आज दिखा। मगर यह, हैरान नहीं करता। सोच में पड़ती फफुदी को और जर्जर करता है। बिहार है, गंगा तो बहेगी ही। मगर, इस गंगा के बीच बच्चों का क्या काम? इसका जवाब यह, बहती गंगा के बीच जान जोखिम में हैं। उस जोखिम को कांधे पर लादे बच्चे भी हैं। उन्हें देश के लायक बनाने वाले गुरूजी भी हैं। सभी नाव पर बैठे हैं। नाव विद्यालय जा रही है। विवश बच्चे और शिक्षक कभी खुद को देख रहे, कभी गंगा की बहती धार को, जो इन दिनों उफन रही। उसी ऊफान में नाव है। बह रही है।

आइए खबर की ओर, बिहार का अंग प्रदेश है भागलपुर। सिल्क के विदेशों तक मशहूर है। मगर, इस जिले में गंगा के जलस्तर में लगातार वृद्धि के बीच जब गंगा खतरे के निशान के समीप गंगा से सटे निचले इलाके में बाढ़ का पानी भर गया है, बाढ़ से सबौर के दियारा क्षेत्र में बच्चों और शिक्षकों के जान फंसे हैं। स्कूल छोड़ नहीं सकते। जोखिम में डालकर विद्यालय जा भी नहीं सकते। मजबूर बच्चे, नाव पर सवार होकर शिक्षकों के साथ विद्यालय आ-जा रहे हैं।

यह विद्यालय भागलपुर के सबौर अंतर्गत संतनगर का है। इस विद्यालय में प्राथमिक विद्यालय संतनगर के अलावा प्राथमिक विद्यालय लालूचक दियारा दोनों एक साथ चलते हैं। बच्चों को विद्यालय तक लाने और ले जाने की कवायद शिक्षक और प्रभारी को करना पड़ता है। शिक्षक संजय कुमार और प्रभारी कुमारी प्रियंका बताते हैं, गंगा का जलस्तर बढ़ने के चलते विद्यालय आने जाने में परेशानी हो रही है। लेकिन बच्चों का हौसला देखकर हमलोग काफी खुश हैं। शिक्षकों को मलाल है, सरकार पहले से कुछ तैयारी करती तो शायद इतनी परेशानियों का सामना बच्चों को नहीं करना पड़ता।

सवाल का जवाब यह है, यहां ऐसा हर साल होता है। गंगा का जलस्तर हर साल बढ़ता है। विद्यालय के बच्चों को नाव ही नसीब है। बारिश के मौसम जब अपने तेवर को बदलते हैं और गंगा में उफान आता है, तो बच्चों और शिक्षकों को काफी परेशानियों का सामना कर विद्यालय जाना और आना पड़ता है। इसके चलते बच्चों की पढ़ाई पर भी काफी असर पड़ता है। इस तरह उफनती गंगा में बच्चों को विद्यालय तक नाव से जाने आने के क्रम में कभी भी बड़ी दुर्घटना हो सकती है। मगर, बिहार का यह एकलौता स्कूल होगा ऐसा नहीं माना जा रहा, कई हैं, नदियों के जद में जहां पहुंचना आज भी नाव के सहारे ही होती है। जिस स्कूल में गर्मी की छुट्‌टी नहीं, बाढ़ की छुट्‌टी होती है, मानो किसी स्कूल ने रविवार की जगह शुक्रवार को ही स्कूल बंद कर लिया हो। मगर, ये सरकार है, मानो पुलिस, घटना के बाद रोना-धोना, राग-अलाप। बड़े-बड़े स्लोगन। नामचीन भाषण। क्या हुआ, शुक्रवार को स्कूल खुले या अभी भी बंद ही हो रहे…जवाब आपको भी शायद ही मालूम हो।

खैर, देश बुलेट ट्रेन पकड़ने जा रही है। इसी का मजा लीजिए। आठ सालों में हम विश्व गुरू बन गए। इसी तंद्रा में बैठे रहिए। भारत का स्वर्णिम काल हम देख रहे हैं, इसी भ्रम में जिंदा रहिए। भ्रष्टाचार पर ठीक ढ़ाई बजे, अलार्म के साथ ब्लीडिंग की दीवारें मलबे में बदल रही, इसकी वीडियो निहारते रहिए।

मगर, मनुष्य का तन, उसकी सोच, उसका धर्म, उसका आध्यात्म, उसकी इच्छा शक्ति, उसकी जरूरत, उसकी परेशानी हर जगह जीएसटी,सीएसटी,। मगर, ये सरकार है। यह उसी कुर्सी के ईद-उसी जनता के गिर्द अपना प्रमोशन खोज रही है। सीएम से लेकर पीएम तक की कुर्सी की रेस में खुद को पेश कर रही है।  अगर, देश यूं चलेगा, अगर बच्चे यूं ही नाव से स्कूल जाते रहेंगे…फिर…कोऊ नृप होय हमें का हानि।
बहती गंगा...फिर...कोऊ नृप होय हमें का हानि...सच मानो तो मनोरंजन ठाकुर के साथ

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