
देशज टाइम्स अपराध ब्यूरो प्रमुख। हाल में चर्चित हुए पूर्णिया एसपी की कलंक कथा क्या दरभंगा क्षेत्र में भी हावी है?
क्योंकि इस क्षेत्र के तीनों जिलों में कमोवेश पटकथा कुछ ऐसी ही दिखाई देती है।
अगर मामले की जांच समय रहते हो जाय तो संभव है कि इन रहस्यों से पर्दा उठ जाय। मुख्यमंत्री सचिवालय की ओर से जांच कराने का जिम्मा डीजीपी को दे दिया गया है। और, निर्देशित किया गया है कि इस पूरे घटना क्रम की बिंदु बार जांच कराकर मुख्यमंत्री कार्यालय को सौंपे।
लेकिन, दस दिनों से ऊपर बीत जाने के बाद भी अब तक इस मामले की जांच को उन्होंने किसी भी विभाग को अग्रसारित नहीं किया है। कार्रवाई के बाबत देर होता देख इस बाबत पूर्व सांसद प्रतिनिधि रवींद्र कुमार सिंह ने 19 अक्टूबर को डीजीपी से मिलकर कहा है कि अविलंब इस मामले की जांच कराई जाए।
श्री सिंह ने कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि आईजी के प्रभाव के कारण ही तीनों जिला में कई दागी पुलिस कर्मी थानाध्यक्ष बने हुये है उसने कहा है कि ऐसे दागी थानाध्यक्षो से एक मोटी रकम लेकर थाना फिक्स किया जाता है। यही नहीं कई कांडों का हवाला देते हुये कहा है कि बड़े बड़े कांडों में आईजी के दिशा निर्देश पर अभियुक्तों को बख्शा गया है जिसके एवज में मोटी रकम ली गई है। रवींद्र का आरोप है कि जिस थानाध्यक्ष पर आरोप सिद्ध हुये और विभागीय कारवाई हुई आखिर फिर उसे थानाध्यक्ष कैसे बनाया गया?
रवींद्र ने कहा है कि आई जी की पोस्टिंग जब सरकार ने दरभंगा आईजी के रूप में किया तो लोंगों को काफी उम्मीद थी लेकिन ठीक इसके विपरीत उन्होंने भ्रष्ट और भ्रष्टाचार को बढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। रवींद्र ने कहा है कि दरभंगा योगदान के बाद आईजी ने सहरसा से एक सिपाही राहुल कुमार को दरभंगा में प्रतिनियुक्ति कराया फिलहाल उसे पुनः उसी जिला के लिये वापस कर दिया गया है।
रवींद्र का आरोप है कि राहुल के दरभंगा योगदान और उसके यहां से जाने के बीच के अवधि में उसके मोबाइल 8789902516 के काल डिटेल्स को खंगाला जाय तो तीनों जिले का कोई थाना नहीं बचेगा जहां उसने फोन नहीं किया हो। और, बार-बार नहीं किया हो।
कहा गया है कि सिपाही राहुल का मकसद बस थानाध्यक्ष और ओपी अध्यक्ष से मासिक वसूलना था। अब सवाल यह उठता है कि क्या वास्तव में सिपाही राहुल थानेदारो से मासिक नजराना लेता था। फिलहाल यह जांच का विषय है। अब एक सवाल रवींद्र के आवेदन से जरूर उठता है कि दागी पुलिसकर्मी थानाध्यक्ष पद पर विराजमान कैसे हुआ है?
जब इंस्पेक्टर रेंक के स्वच्छ पदाधिकारी जिले में हैं तो प्रभार में रहकर दागी पुलिस पदाधिकारी कैसे थाना चला रहे हैं। कहीं, एसपी की भूमिका संदिग्ध तो नहीं? क्योंकि आईजी तो किसी थानाध्यक्ष की डायरेक्ट पोस्टिंग तो करते नहीं, जिले में थानाध्यक्ष की सूची तो जिला के एसपी ही तय करते हैं। आईजी के पास अनुमोदन कर या फिर अनुमोदन के लिये भेजते हैं। इसके बाद आईजी की सहमति या असहमति होती है। फिर, ऐसे में एक आईजी पर आरोप गढ़ना बेईमानी होगी क्योंकि एसपी भी उतने ही जिम्मेदार हैं।
ऐसे में, सवाल उठता है क्या यह सिस्टम आपस में गठजोड़ कर काम करता है? कई ऐसे मामले हैं जिसमें डीजीपी के आदेश को आईजी स्तर से अवहेलना किया गया है। पुलिस मुख्यालय ने कई पुलिस कर्मियों को दूसरे जिला के लिये स्थानांतरण किया। लेकिन, आईजी ने उसे फिर उसी जिला में समायोजन कर दिया। जिस जिला से उनकी बदली हुई थी, ऐसे में सवाल उठना भी लाजमी है।
ऐसे कई सवालों में सिपाही राहुल (सुपर आईजी) की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। अब देखना है कि डीजीपी महोदय आईजी पर लगे आरोपों की जांच किस विभाग से कराते हैं, ताकि आम लोगों का विश्वास सरकार पर बना रहें। पूर्णिया एसपी दयाशंकर और गया के तत्कालीन एसपी आदित्य कुमार की कार्यशैली ने वैसे ही आईपीएस जैसे बड़े पद को दागदार कर दिया है। कई जिले ऐसे हैं जहां के एसपी की कार्यशैली सवालों के घेरे में है। फिर सवाल है कि क्या ऐसे ही चलता रहेगा बिहार?
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