



राणा दत्ता, देशज ग्रुप ऑफ प्रिंट। जिंदा रहे चाहे जान जाएं। वोट उसी को दो जो काम आएं।बदल जाओ वक्त के साथ या फिर वक्त बदलना सीखो, मजबूरियों को मत कोसो हर हाल में चलना सीखो। कारण, भारतीय लोकतंत्र के सागर में लगातार अपनी नाव खेते वे नई जमीन की खोज करते हैं, नए बंदरगाहों पर लंगर डालते हैं, उकता कर फिर से चप्पू उठाते हैं या नाव ही बदल डालते हैं। वे राजनीति शास्त्र का भूगोल बदलते हैं और उनके बिना राजनीति का इतिहास नहीं लिखा जा सकता। कश्मीर से कन्याकुमारी तक उनकी जमात हर रोज बढ़ रही है और जब चुनावी झंझावात क्षितिज पर घिरता है, तो वे दोगुने जोश से लहरों में कूद पड़ते हैं।
मानवीय राग-विराग से परे वे कर्मयोगी बने रहते हैं। कोई उनका सगा नहीं होता, लेकिन वे सबके चहेते हैं। राजनीति उनके बिना नहीं चल सकती, क्योंकि जाति, धर्म, बाहुबल और धनबल की उनकी पूंजी सबको लुभाती है, जिसके बिना इस देश की चंचला राजनीति को वश में नहीं किया जा सकता। रास्ते में देखा, एक नेता जैसा आदमी…एक गरीब के पैर पर पड़ा था। मुझे आश्चर्य हुआ, पता चला वह चुनाव में खड़ा था। कुछ दूर,गरीबों का मोहल्ला था। देखा वहां बहुत हल्ला था। वहां एक घटना घटी। घर-घर शराब बंटी। रात में जब सब सो रहे थे।नेताजी… चुनाव के बीज बो रहे थे। नेताजी के लोग दुबककर मलाई चाट रहे थे। चुनावी पर्चियों में रखकर पांच सौ के नोट बांट रहे थे। नेताजी महिलाओं से रिश्ते सान रहे थे। कुछ प्यार कुछ मनुहार बाकी फुफकार। कुछ पैसे कुछ डंडे ये हैं नेताजी के चुनावी हथकंडे।



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