



चुनावी माहौल गर्म है, बयानबाजियों का दौर भी तेज हो चला है, नेता रैली जोर पकड़ चुकी है और जनता की अदालत में नेताओं की अग्निपरीक्षा का वक्त आ गया है। जिन्दा रहे चाहे जान जाएं वोट उसी को दो जो काम आएं बदल जाओ वक्त के साथ या फिर वक्त बदलना सीखो मजबूरियों को मत कोसो हर हाल में चलना सीखो। सियासत की अपनी अलग इक जबां है लिखा हो जो इकरार, इनकार पढ़ना नए किरदार आते जा रहे हैं मगर नाटक पुराना चल रहा है।
झुकाना सीखना पड़ता है सर लोगों के क़दमों में यूं ही जम्हूरियत में हाथ सरदारी नहीं आती – यहां तो सिर्फ गूंगे और बहरे लोग बसते हैं खुदा जाने यहां पर किस तरह जलसा हुआ होगा। जम्हूरियत इक तर्ज़-ए-हुकूमत है कि जिसमें बंदों को गिना करते हैं, तौला नहीं करते। हालात यही है, कानून व्यवस्था चौपट है। जनता विकास का हिसाब मांग रही है। पिछले चुनाव के घोषणा पत्रों को पढ़ा जा रहा है। एक भी वायदे पूरे नहीं हुए कौन देगा हिसाब।



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