



सुना है एक बार फिर, चुनाव का मौसम लहलहा रहा है। चाय की दौर चल रही है। पैसे से लोग खरीदे जा रहे हैं। निकल पड़े हैं सब दल बल सहित अपने अपने हथियारों के साथ शब्दबाणों का करके भयंकर वार और अपने चहेतों को पाटने की चल रही तैयारी। करना चाहते हैं पूरी सेना को धराशाई। भूलकर इस सत्य को चुनाव है भाई। यहां साम दाम दंड भेद की नीतियां अपनाकर ही जीती जा सकती है लड़ाई जी हां, इसी लिए तो एक ही कर्ता-धर्ता हर भीड़ में दिख रहे।
न केवल तोड़े जाएंगे दूसरे दलों के शीर्ष नेता बल्कि जरूरी है आज के समय में अपनों पर भी शिकंजा तो चाय के साथ फरमाइशें बढ़ा रहे हैं। जिसकी जितनी चादर होगी उतने पांव पसारेगा, मगर जिसका होगा शासन वो ही कमान संभालेगा, करेगा मनमाने जोड़ तोड़ विरोधियों को करने को ख़ारिज, जरूरी है आज अपनी जय जयकार स्वयं करनी, और सबसे करवानी, बस यही है सुशासन, यही है अच्छे दिन की चाशनी जिसमें जनता को एक बार फिर ठगने का मौका हाथ लगा है।




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