



ये आम दिन हैं सड़क पर फ़ोन बजता हैसैंकड़ों वाहनों के बीच बातें करते हैं हमजीवन के रंगों की बातें हैं दफ्तर के रंग बच्चों के रंगजैसे वर्षों से बसन्त ढूँढतीऔरत का रंगछत की मुण्डेर से आस्मान में चल पड़ते आदमी का रंगख़ुद से ही छिपती जाती
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लड़की का रंगकुछ रंग वर्षों से धुँधले होते गए हैंऔर हम भूल ही जाते हैं उन्हेंयूँ सड़क पर फ़ोन परअपने दिनों पर बातें करते हुएहम मान लेते हैं कि ज़िन्दगी अभी भी जीने लायक हैअचानक आती है कवियों की गुहारकि बाक़ी लोगों का क्या होगाअपनी तो सोच लीबाक़ी लोगों का क्या होगा ।
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