



सरकार कहती है, मैट्रिक-इंटर परीक्षा मे खराब रिजल्ट देने वाले शिक्षक व अफसर जबरन रिटायर होंगे लेकिन सिस्टम को सुधारने वाले ईमान पाएंगें। सरकारी स्कूलों की हालत देखिए। बिना पैर में जूता पहने, बोरे पर बैठकर बच्चे पढ़ाई ही नहीं करते बल्कि शिक्षक का इंतजार करते रहते मिलते हैं जर्जर छतों से झांकती रोशनियों के बीच और मास्टर साहेब कभी चुनाव कराने, कभी जनगणना करने तो कभी बिना बताए स्कूल से गायब रहते हैं। बिहार में सुशासन का प्रचार तो खूब किया जाता है पर बिहार की जमीनी हकीकत ठीक इस प्रचार के विपरीत है। आईए बात की जाए सुशासन के एक बहुत ही महत्वपूर्ण पहलू “प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षा” की। बिहार में प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षा की दिशा और दशा दोनों ठीक नहीं है।
माध्यमिक शिक्षा की बदहाल स्थिति को तो खुद बिहार सरकार के द्वारा प्रदत आंकड़े ही साबित करते हैं। आंकड़ों के अनुसार 5500 ग्राम पंचायतों में अब भी एक भी माध्यमिक विद्यालय नहीं है। राज्य में 8400 से अधिक ग्राम पंचायत है, जिनमें से 5500 में एक भी माध्यमिक विद्यालय (सेकेंडरी) नहीं है। यानि 65 प्रतिशत से भी ज्यादा पंचायतों में एक भी माध्यमिक विद्यालय नहीं है। यही हालत सड़कों की है। सड़कें चाहें राजधानी पटना की हो या दरभंगा की हर जगह अतिक्रमणकारी हावी हैं। मगर कार्रवाई करेगा कौन। डीएम साहेब अधिकारियों पर हंटर चलाने में व्यस्त, एसपी साहेब शराब माफिया के पीछे, वाहन की जांच करते। ऐसे में हालात यही, देखने सूरत गया था आइने के सामने आईना रोने लगा हालत हमारी देखकर।





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