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फ़रवरी, 12, 2026
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Bihar सरकार के फरमान आते हैं, ठंडे बस्ते में चले जाते हैं…DGP कहते हैं…अधिकारी सुनते हैं…रद्दी की टोकरी में फेंक देते हैं…यही है मौजूदा Policing सब ठांय-ठांय फिस्स!

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संजय कुमार राय, देशज टाइम्स अपराध ब्यूरो प्रमुख। बिहार में बेहतर पुलिसिंग की बात करना बेईमानी है। विगत दस वर्षों के दौरान इस व्यवस्था में भारी गिरावट हुई है। इस पर नियंत्रण करना एक मुश्किल काम है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार मतलब सरकार के कई फरमान आते रहते हैं, मगर सभी के सभी हवा हवाई हो जाते हैं। लेकिन, इसका खामियाजा आम जनता उठा रही हैं।

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लोग परेशान हैं। थाना, डीएसपी, एसपी समेत जितने भी सरकारी नंबर हैं, यह उठने के लिए अब शोभा के लायक बना दिया गया है। हां, व्हाट्स ऐप काल कीजिये तो कहीं-कहीं उठा भी लेते हैं।

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सरकार एवं सरकारी तंत्रों का ऐसा गठजोड़ है कि आप न्याय के लिये भटकते रह जाएंगे लेकिन आपको न्याय नहीं मिलेगा। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार एक दशक पहले जहां जाते थे, कहते थे जनता दरबार लगाइये, जिला में जनता दरबार लगता भी था, लेकिन कुछ साल कुछ महीने तक चला फिर वहीं बात।

जनता दरबार आज भी लग रहें हैं। पर, जब एसएसपी ही नियमित नहीं बैठते तो बात करना बेईमानी है। थाना, डीएसपी या एसएसपी या आईजी के यहां शिकायत पेटी लगाने का आदेश सरकार ने दिया था, कई जगहों पर यह पेटी लगा भी, कुछ दिनों के बाद वह पेटी कहां गया पता नहीं चला। दरभंगा में एक मुहिम चला था अधिकारी की घंटी बजाओ…मगर सब कूड़े में।

अगर पेटी कहीं-कहीं हैं भी तो आवेदन कौन निकालेगा। अगर आवेदन निकल भी गया तो वह रद्दी की टोकरी में। सरकार ने लोंगों की शिकायत के सुनने लिये थाना मैनेजर की पोस्टिंग की, आगंतुक कक्ष बनाये गये पर आगंतुक कक्ष में बस ताला लगा मिलेगा।

जिला स्तर पर सिस्टम इतना भ्रष्ट कि न्याय की बात करना बेईमानी है। एक समय था जब थानाध्यक्ष किसी पीड़ित का प्राथमिकी दर्ज नहीं करते थे। और, उनकी शिकायत एसपी/एसएसपी तक पहुंच जाती थी तो निलंबन होना तय था।

क्योंकि, सुप्रीम कोर्ट का भी आदेश है कि कोई पीड़ित आवेदन देता है तो प्राथमिकी तुरंत दर्ज की जाय। अब तो किसी आम आदमी को प्राथमिकी दर्ज कराने में भी आर्थिक बोझ का सहन करना पड़ता हैं।

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समय ज्यों-ज्यों बढ़ता गया,तरीके बदलतें चले गये। अब तो कोई भी पर्यवेक्षणकर्ता घटना स्थल तक जाते भी नहीं हैं।बस कागजी खानापूर्ति होती हैं। कई जिलों में डीएसपी स्तर के पदाधिकारियों की दुकान चलती हैं। और, इसका शिकार आम आदमी होते हैं। तंग और तबाह कोई एक दो व्यक्ति नहीं हैं गिनती करते थक जाएंगे।

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विभाग कोई भी हो लेन-देन के चक्कर में सभी एक-दूसरे के पूरक हैं। ज्यादातर डीएसपी के प्रतिवेदन को एसपी भी सत्य करार देते हैं। एसपी भी किसी घटना स्थल पर नहीं जाते हैं। इसका असर सरकार या सरकार के आलाधिकारी पर भी नहीं पड़ता।

 

पत्राचार अगर हो भी गया, आलाधिकारी दबाव बना भी दिये तो वह जिलेबिया मोड़ हो जाता है। घूमते फिरतें वह पत्र फिर उसी स्थान पर पहुंच जाता है, जहां से चला था। इस दौरान वक्त खपाया जाता है। और, लोग भूल जाते हैं।

मामला इतिश्री भी हो जाता हैं। सभी विभागों में पुलिस एक ऐसा विभाग है जहां से लोगों की उम्मीद जगती हैं। न्याय की पहली सीढ़ी भी शुरू होती हैं। ऐसे में, लोगों को अगर न्याय नहीं मिलें तो ऐसी व्यवस्था का क्या मतलब।

 

डीजीपी का आदेश या मुख्यालय का आदेश एसपी/एसएसपी/आईजी की ओर से रद्दी की टोकरी में फेक दिया जाता हैं। इसके बाद एसपी/एसएसपी मनमर्जी करते हैं। अवैध उगाही के चक्कर में दागियों को थानाध्यक्ष बना देते हैं।

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इस कारण थानाध्यक्ष भी मनमानी करते हैं। ऐसा लगता है कि पुलिस विभाग में अनुशासन नाम का कोई बात नहीं रह गया। लेकिन इन सभी बातों के बीच भुगतना तो आम जनता को पड़ता हैं।

गंभीर मामलों में भी पीड़ित पक्ष को और प्रताड़ित किया जाता हैं और ऐसे पीड़ित लोग एसपी /एसएसपी /आई जी यहां तक कि डीजीपी से शिकायत करते रहते हैं पर इसका कोई असर नहीं होता। यहां तक कहा जा सकता हैं कि मुख्यमंत्री के जनता दरबार में जब शिकायत होती हैं तो मुख्यमंत्री संबंधित अधिकारियों को फोन कर कार्रवाई का निर्देश देते हैं लेकिन इसके बाद कार्रवाई क्या होता हैं यह जनता दरबार में गये पीड़ित पक्ष ही बता सकते हैं।

समीक्षा के नाम पर अधिकारी बस इंटरटेन करते हैं। बात फिर वहीं आकर खड़ी हो जाती हैं। कई लोगों का यही सवाल हैं कि न्याय कैसे मिलेगा? कौन देगा? कहां फरियाद करें? जवाब कौन देगा? जवाबदेही किसकी है…?

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