
बिहार की सुभद्रा देवी विश्व प्रसिद्ध मधुबनी पेपर मैशे कलाकार हैं। कला के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने आज उन्हें पद्मश्री 2023 से सम्मानित किया। जानिए कौन हैं सुभद्रा देवी जिन्हें आज पद्मश्री सम्मान से नवाजा गया है।
बचपन में दूसरों को देख पेपरमेसी कला सीखने वाली और अब विदेशों तक शोहरत बंटोरती पद्मश्री से सम्मानित मधुबनी जिले की सलेमपुर गांव की रहने वाली सुभद्रा देवी आज पूरे विश्व मे पेपरमेसी कला की धरोहर बन चुकी हैं।
सुभद्रा देवी की तीन बेटियां और दो बेटे हैं। वर्तमान में वह अभी अपने छोटे बेटे के साथ दिल्ली में रहती हैं। सुभद्रा देवी का मायका दरभंगा जिले में मनीगाछी के निकट बलौर गांव में है। जिस कला के लिए उनको नवाजा गया है वो भी अनोखा है। पेपर मेसी कला में कागज को पानी में पहले फुलाया जाता है। फिर उसे कूटकर विभिन्न आकार दिया जाता है।
भोली-भाली सूरत और सरल स्वभाव की मालकिन सुभद्रा देवी को वर्ष 1980 में राज्य पुरस्कार और 1991 में राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। पेपरमेसी से मुखौटे, खिलौने, मूर्तियां, की-रिंग, पशु-पक्षी, ज्वेलरी और मॉडर्न आर्ट की कलाकृतियां बनाई जाती हैं। इसके अलावा अब प्लेट, कटोरी, ट्रे समेत काम का आइटम भी पेपरमेसी से बनता है। पेपरमेसी कलाकृतियों को आकर्षक रूप के कारण लोग महंगे दामों पर भी खरीदने को तैयार रहते हैं।
पहली बार इस कला को बढ़ावा देने वाले किसी कलाकार के नाम पद्मश्री की घोषणा हुई तो कला और फिल्म समीक्षक विनोद अनुपम ने कहा- “ऐसी कलाओं के कलाकार को पुरस्कार या सम्मान की घोषणा से अचानक उस कला की भी झूमकर चर्चा होने लगती है। यह चर्चा बनी रहे और इस सम्मान के जरिए भी इस कला का विस्तार हो तो निश्चित रूप से यह बिहार के लिए और भी बड़ी बात होगी।
केंद्रीय सरकार ने 74वें गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर पद्म पुरस्कारों का ऐलान करते हुए सलेमपुर गांव की रहने वाली सुभद्रा देवी को सम्मानित करने का फैसला सुनाया था। उन्हें तनिक भी आभास नहीं था कि उनकी कला को इतनी शोहरत मिलेगी. 82 वर्ष की हो चुकीं सुभद्रा देवी को पेपरमेसी की कला में महारत हासिल है। उन्हीं की बदौलत अब इस कला को देश ही नहीं, विदेशों में भी अलग पहचान मिल चुकी है।
गांव-घर में जो काम आप बचपन में खेलने के लिए करें, अगर उसमें संभावना देखते जाएं तो कितना बड़ा नाम हो सकता है? इसका जवाब है सुभद्रा देवी। सुभद्रा देवी को पेपरमेसी के लिए पद्मश्री मिला है। पेपरमेसी मूल रूप से जम्मू-कश्मीर की कला के रूप में प्रसिद्ध है, लेकिन सुभद्रा देवी ने बचपन में इस कला से खेला करती थीं।
सबसे पहले यह जानना रोचक है कि पेपरमेसी होता क्या है? दरअसल, कागज को पानी में गलाकर उसे रेशे के लुगदी के रूप में तैयार करना और फिर नीना थोथा व गोंद मिलाकर उसे पेस्ट की तरह बनाते हुए उससे कलाकृतियां तैयार करना पेपरमेसी कला है।
सुभद्रा देवी दरभंगा के मनीगाछी से ब्याह कर मधुबनी के सलेमपुर पहुंचीं तो भी इस कला से खेलना नहीं छोड़ा। आज जब पद्मश्री की घोषणा हुईं तो सुभद्रा देवी दिल्ली में बेटे-पतोहू के पास रहती हैं। घर से इतनी दूरी के बावजूद वह पेपरमेसी से दूर नहीं गई हैं। वहां से भी इस कला के विस्तार की हर संभावना देखती हैं। बड़े मंचों तक इसे पहुंचाने की जद्दोजहद में रहती हैं।





