



दरभंगा, देशज टाइम्स। अगर आप टीवी देखते हैं तो आपने टीआरपी के बारे में तो सुना ही होगा। ये टीआरपी इन दिनों बढ़ाने के लिए बड़े बड़े राजनेताओं से लेकर अभिनेताओं तक कोशिश में जुटे हैं। अब देखिए ना मोदी को आम पसंद है कि नहीं अगर पंसद है तो कैसे खाते हैं उसे काटकर खाते हैं या बेसिन के पास जाकर सीधे मुंह लगाते हैं बगैर-बगैरह उन चीजों से जुड़ा है जहां टीवी चैनल वाले अपना टीआरपी बढ़ाने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपनाते हैं लेकिन इससे आम पाठक व दर्शक हमेशा खुद को ठगा महसूस करता है।
अब देखिए ना, अरूणांचल में ठीक चुनाव परिणाम के बाद विधायक समेत ग्यारह लोगों की मौत की खबर महज इस वजह से दब गई कि मोदी को दिखाना था। आखिर, टेलीविजन की दुनिया में टीआरपी का इतना बड़ा महत्व कैसे हो गया है। क्या अब यह टेलीविजन कार्यक्रमों की लोकप्रियता मापने का तरीका है। मगर अब यह टेंशन देती है। टीआरपी और टेंशन दिन में टेंशन रात में टेंशन जागते हुए टेंशन सोते हुए टेंशन क्या बनाउं.. क्या दिखाउं… क्या करूं की टीआरपी आए… टीआरीपी पागल बना देगी टीआरपी बुड्ढा बना देगी टीआरीपी दिमाग का दिवाला निकाल देगी टीवी का कौन सा दैत्य निकालूं टीवी पर कौन सा विनाश फैलाऊं टीवी पर लोगों को कैसे डराऊं अब हर बुधवार खुद डरता हूं टीआरीपी के टेंशन में रहता हूं सर मेरा शो उपर.. सर उसका शो नीचे.. यही सुनता रहता हूं…।
यह बात कोई और नहीं बल्कि टीवी पत्रकार एरंजन भी स्वीकारी है। हकीकत यही है, टीआरपी के नाम पर पाठकों या दर्शकों का दोहन हो रहा है। यह बर्दाश्त के बाहर होता जा रहा है। इसी से तंग आकर विपक्षी पार्टियों ने अब टीवी से खुद को दूर रखने का फैसला किया है यह बेहद ही उचित कदम है। जिस तरीके कुछ चैनलों पर पार्टियों के प्रवक्ताओं को बैठाकर उनके साथ दुर्व्यवहार हो रहा है यह कदम बेहद सटीक व उचित है। इसपर विपक्ष को कायम रहना चाहिए ताकि लोकतंत्र का चौथा स्तंभ मजबूत रहे।







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