



त्योहारों के हमारे परंपरावादी देश में होली ऐसा पर्व है, जो हरेक को चाहे-अनचाहे और जाने-अनजाने अपने कच्चे-पक्के रंग में सराबोर कर देता है। चेहरे ऐसे रंगारंग हो जाते हैं कि धर्म, जाति, वर्ण और संप्रदाय की सारी पहचान गुम हो जाती है। विवाद, विषाद और विविधता को भूलकर एक ही स्वर गूँजने लगता है- होली है। होली ऐसा पर्व है, जो हरेक को चाहे-अनचाहे और जाने-अनजाने अपने कच्चे-पक्के रंग में सराबोर कर देता है। चेहरे ऐसे रंगारंग हो जाते हैं कि धर्म, जाति, वर्ण और संप्रदाय की सारी पहचान गुम हो जाती है। गुलजार खिले हों परियों के और मजलिस की तैयारी हो कपड़ों पर रंग की छींटों से खुशरंग अजब गुलकारी हो मुंह लाल गुलाबी आंखें हों
और हाथों में पिचकारी हो उस रंग भरी पिचकारी को अंगिया पर तक कर मारी हो तब देख नजारे होली के। मुहैया सब है अब अस्बाबे होली। उठो यारों भरों रंगों से झोली। मगर हालात यही है, नीतीश सरकार के राज में शराब पर पाबंदी पर लोग जमकर दारू का लुत्फ उठा रहे हैं। कोई रोकटोक नहीं है। घर पर होम डिलेवरी है। हां, पकड़े गए तो कुछ रस्मअदायगी पुलिसवाले करते जरूर हैं मगर, बड़े रसूखवाले तो छककर तब भी पिया करते हैं। गरीबों के मयखाने अब पहले जैसे आबाद नहीं होते हां, जेब ढ़ीली होने से रसूखवाले भी संभलकर ही पीते हैं मगर होली है साहेब यहां तो खुली छूट रहेगी मगर दादा कहिन इस शेर की तरह… अब तो उतनी भी मयस्सर नहीं मय-ख़ाने में जितनी हम छोड़ दिया करते थे पैमाने में।



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