



दरभंगा, देशज टाइम्स। कर्ण क्लासेस के संचालक के जहर खाने के बाद दरभंगा की पत्रकारिता का लहू सफेद होता दिख रहा है। ताकत कमजोर पड़ती दिख रही है। गुटबाजी भी सामने है। ऐसे में यहां की पत्रकारिता संतुलित, सुलभ, स्वच्छ, साहसी दिखे इसकी पहल करेगा कौन? आपस में लड़कर हम उस चरित्र को सही नहीं साबित कर सकते जिसकी भाषाई जंग सामने दिख रही है।
आखिर, एक पत्रकार होता कौन है किसी को धमकाने वाला, आखिर एक पत्रकार होता कौन है किसी को नीचा दिखाने के तमाम हथकंडे अपनाने की अति तक जाने वाला। पत्रकार आज के दौर में सिर्फ एक बधुआ मजदूर है। मजदूरी मालिक से मिलती नहीं। मालिक खुद खून चूसने को तैयार बैठा है। यहां अखबार वालों को हर चीज फ्री में चाहिए। ऐसे में, पत्रकारिता का ही ना दोहन करेंगे। पत्रकारिता को ही ना चूसेंगे।
मगर, लोग पहले से अब अधिक सचेत हो चुके हैं। दरभंगा का मिजाज अब बदल रहा है। जरूरत है पत्रकारों को भी अपनी सोच बदलने की, मगर दिक्कत यह, यहां के अधिकांश पत्रकार सिर्फ झोला उठाना जानते हैं, अपनी ताकत अपनी लेखनी, अपनी भाषा को मजबूत करना नहीं। यही वजह है, हमारी साख घट रही है। हम कहीं पिट रहे हैं कहीं खुद मुंह छुपाकर भाग रहे। सोचिए…।






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