



लाठियां वहीं चटकती है जहां गरीबों का बसेरा होता है। वो एक दौर था जब गरीबी पर तरस खाते थे लोग दौर अब यह आ गया गरीबी के नाम पर कफन बेचते हैं लोग। उम्मीद जिससे थी वो तो कब का गांधी टोपी पहने निकल लिए जो बचे लाल टोपी में गरीबों पर लाठियां सेंकने लगे। अरे देश को जानने वालों, हकीकत यही है, वो ग़रीबी से हर रोज़ मरता रहा, सर नगीने जड़ा ताज सजता रहा, राजनीति का स्तर है ऐसा गिरा आम इंसान इसमें उलझता रहा। रोटियों के लिए हम तरसते रहे, और गोदाम में धान सड़ता रहा।
बेटियां ब्याह की चाह में ही रहीं, बाप बूढ़ा रक़म को भटकता रहा। राह दुशवार भी हर क़दम पर मिली, गरीब बार-बार गिरता रहा फिर संभलता रहा। मगर यकीन मानिए ऐ मेरे दोस्त आज भी, तहजीब की मिसाल गरीबों के घर पे है, दुपट्टा फटा हुआ है मगर उनके सर पे है। ऐ सियासत… तूने भी इस दौर में कमाल कर दिया, गरीबों को गरीब अमीरों को माला-माल कर दिया। जनाजा बहुत भारी था उस गरीब का, शायद सारे अरमान साथ लिए जा रहा था। मगर यकीन मानिए, हमारे देश की मौजूदा हालात यही है, यहां गरीब को मरने की इसलिए भी जल्दी है साहब, कहीं जिंदगी की कशमकश में कफ़न महंगा ना हो जाए।



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