



दरभंगा, देशज टाइम्स। मायूसी ज़िंदगी में एक मनफ़ी क़दर के तौर पर देखी जाती है लेकिन ज़िंदगी की सफ़्फ़ाकियां मायूसी के एहसास से निकलने ही नहीं देतीं। इस सब के बावजूद ज़िंदगी मुसलसल मायूसी से पैकार किए जाने का नाम ही है। हम मायूस होते हैं लेकिन फिर एक नए हौसले के साथ एक नए सफ़र पर गामज़न हो जाते हैं।
मायूसी की मुख़्तलिफ़ सूरतों और जहतों को मौज़ू बनाने वाला हमारा ये इन्तिख़ाब ज़िंदगी को ख़ुश-गवार बनाने की एक सूरत है। आस क्या अब तो उमीद-ए-नाउमीदी भी नहीं कौन दे मुझ को तसल्ली कौन बहलाए मुझे। भरी दुनिया में जी नहीं लगता जाने किस चीज़ की कमी है अभी।
हार के आगे जीत है साथी हार से मत घबड़ाना, हार से हार के हार गया तो हंसेगा ये जमाना जीत हुई इंसानों की और हार भी इंसान की, हम भी तो इंसान हैं साथी फिर आदत क्यों हार की हार को अपनी ढाल बनाकर जीत की जंग जीत लाना, जीत के जब तुम दिखलाओगे, देखेगा जमाना हार के आगे जीत है साथी।
लक्ष्य तुम्हें जो पाना है उस लक्ष्य पर नज़र गड़ाओ, पीछे मुड़कर कभी ना देखो, आगे बढ़ते जाओ कर्म ही पूजा समझ के साथी कर्म को करते जाना, फल तो ऊपर वाले देंगे, जो भी होगा देना हार के आगे जीत है साथी। नफ़रत में तुम प्यार घोलकर हर मुकाम पा सकते हो, सच्चाई की राह चुनकर हरिश्चन्द्र बन सकते हो जब भी रावण सामने आए श्री राम बन जाना, कंश अगर आ जाए सामने कृष्ण बनकर दिखलाना हार के आगे जीत है साथी…।







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