



बीमारी में डॉक्टर के पास जाने की परंपरा है, लेकिन डॉक्टर केवल निमित्त है। यह निमित्त चाहे झोलाछाप हो या डिग्रीधारी, निमित्त केवल निमित्त होता है। बहरहाल, बीमारी और डॉक्टर के संबंध जन्म-जन्मांतर के होते हैं। बीमार पड़ने पर आदमी अस्पताल जरूर जाता है। बड़ा आदमी बड़े अस्पताल जाता है, जबकि छोटा आदमी किसी भी खैराती अस्पताल में इलाज करवाकर स्वस्थ हो जाता है। ज्यादातर लोग बिना दवा के ठीक होते हैं और श्रेय डॉक्टर को मिलता है। जिन मरीजों को ठीक नहीं होना होता वे किसी भी डॉक्टर से ठीक नहीं होते और सीधे मृत्यु को प्राप्त होते हैं जिसका श्रेय भगवान को दिया जाता है।
आजकल डिग्रीधारी डॉक्टर बनने में बहुत पापड़ बेलने पड़ते हैं। अव्वल तो डोनेशन और कॉलेज की फीस ही इतनी तगड़ी होती है कि सुनकर आदमी को गश्त और मिर्गी इत्यादि आने लगती है और जैसे-तैसे जुगाड़ करके फीस भर भी दी तो पाँच साल तक डॉक्टर बनते-बनते आदमी एक ऐसा डॉक्टर बनकर बाहर निकलता है जो डॉक्टर कम मरीज ज्यादा रहता है। वो जमाना बीत चुका जब, डॉक्टर जिन्दगी में एक एक पाई अपने ज्ञान हुनर और नेक नीयती से कमाते थे, और अपना सारा जीवन मानवता की सेवा में बिताते थे!




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