



जिसमें नींद चैन की आती। वो मच्छर-दानी कहलाती।मगर हमारे शहर में पिस्तौल से चलाया जा रहा है काम कारण, लाल-गुलाबी और हैं धानी, नीली-पीली बड़ी सुहानी, छोटी, बड़ी और दरम्यानी , कई तरह की मच्छरदानी से नहीं चल रहा हमारा काम। डेंगू कर रहा हम पर लगातार हमला जिससे हम बिस्तर पर सुख से सो नहीं हो पा रहे। वो दौर पीछे छूट गया जब जाड़े में मच्छर नहीं दिखती थी आज जब ठंडक आती है गरमी और बारिश से भी ज्यादा मच्छर घर ले आती है।
जाड़े में भी मच्छर हैं बहुत सताते है,भिन-भिन करके शोर मचाते हैं। खून चूस कर दम लेते हैं। डेंगू-फीवर कर देते हैं। मच्छर से छुटकारा पाओ और मच्छरदानी को अपनाओ कि बात शहर में हो गई पुरानी तभी तो कार्टून देखिए दादा कहिन ऐसी नौबत आई। ऐसे में, जन जन का यही हो नारा, डेंगू मुक्त हो शहर हमारा, दूर होगी डेंगू की बीमारी, जब होगी हम सबकी भागीदारी। याद रखिए, इधर भी डेंगू उधर भी डेंगू, जिधर भी देखें डेंगू ही डेंगू, इक नन्हा–सा संक्रमित मच्छर, दे सकता है भयंकर डेंगू। 



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