



शहर में पत्रकारिता के नाम पर जो चेहरे दिखते हैं उसमें पत्रकारिता के कीटाणु कितने हैं क्या उन्होंने कभी पत्रकारिता के एबीसी भी पढ़ा, कहना, समझना मुश्किल लेकिन जब बात पत्रकारिता की होगी तो वही सबसे पहले अगली पंक्ति में बैठे मिलेंगे, शहर में कॉलर ऊॅचा कर घूमते दिखेंगे। हालात यही है,चंद परस्तों के हाथों से, डोर देश की ले लेते, आज़ादी के दिन ही इनसे, भी आज़ादी दे देते। एक बार गर बेईमानों से, पीछा आप छुड़ा देते, एक बार इन नाफरमानों को, औकात दिखा देते। तो दशकों यूं देश ना लुटता, मोती चुगते हंस सभी, रावण ना होते यूं पैदा, नज़र ना आता कंस कभी। शंभु वाला एक हलाहल, प्याला इन्हें पिला देते, वक्त बहुत था शीश दम्भ का, काट तुंग लटका देते। लौह पुरुष जी यही लुहारी,अंतिम काम बना देते,सारा देश अयोध्या होता, तुमको राम बना लेते।
दंश बड़ा दुखदाई है ये, दिल पीड़ा से रोता है, मक्कारी को मंडित कर दें, हमसे ना ये होता है। माना कि यह देश भरा है, मक्कारों के सूबों से, लेकिन हम अंजान नहीं है, कुत्सित इन मंसूबों से। हम तो बस उलझे रहते हैं, अपनी रोज़ी रोटी में, लेकिन तुमको मज़ा आ रहा, मजलूमों की बोटी में। बहुत हो गया छाती पर यूँ, मूंग नहीं दलने देंगें, पाक हिमालय की छाती पर, छाले ना पलने देंगें। हमने अपने मौलिक सपने, देश की खातिर बेचे हैं, लहू सींचकर चमन खिलाया, प्राण हलक से खींचे हैं। हमने सत्ता-धीशों के, पैरों से धरती छीनी हैं, कितने भागे खेत छोड़, कितनों ने लाशें बीनी हैं। तुमने दशकों लूटा है, अब शांत रहो ये नक्कालो, अच्छा करने वालों की, राहों में अड़चन ना डालो। वरना फिर अंजाम तुम्हारा, होगा क्या कुछ सोचा है, मक्कारी को मंडित कर दें, हमसे ना ये होता है।



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