



दरभंगा, देशज टाइम्स। वास्तव में, मीडिया लोकतंत्र का चौथा पाया बन कर भ्रष्टतंत्र में शामिल हो गया है। सच तो यह है कि आज सबसे अधिक मीडिया पर ही निगरानी की जरुरत है। क्योंकि, मीडिया जन को छोड़ कर तंत्र के हितों को साधने में ज्यादा मशगूल है ।आज तक सुनी सुनायी अनुभवों के आधार पर मीडिया को बिकाऊ कहता था पर आज देखा भी। आज तक सुनी सुनायी अनुभवों के आधार पर मीडिया को बिकाऊ कहता था पर आज देखा भी।
आजादी से पहले के समाचार पत्र सही थे तब देश के चौथे स्तम्भ पर भ्रष्टाचार का दाग नहीं लगा था अरे आजकल के पत्रकार तो पत्रकारिता को पैसे कमाने का पेशा समझ रहे हैं जबकि पत्रकारिता पैसे कमाने का पेशा नहीं है वह तो देश को जगाने और देश की गतिविधियाँ निष्पक्ष देने का पेशा है पर आजकल तो पत्रकार भी बिक गए। मीडिया भी बिक गया। आजकल के पत्रकारों को तो आजादी से पहले के पत्रकारों से प्रेरणा लेनी चाहिए तिलक जी ने केसरी अखबार निकाला उसमें आजादी की गतिविधियों के बारे में सही विवरण दिया और महात्मा गांधी ने यंग इंडिया में ग्राम स्वराज पर लिखा देशबंधु चितरंजन जी ने सैनिक समाचार पत्र चलाया और उसमें आजादी पर ही लिखा वह भी निष्पक्ष देश की इज्जत पहले ही मिटटी में मिली है।
मीडिया का सबसे बड़ा नुकसान राजनेताओं ने किया है। आज कई प्रांतीय अख़बार और न्यूज चैनलों पर राजनेताओं का मालिकाना हक़ है। मीडिया के जरिए गैर–मीडिया कारोबारों की तरह राजनीति को भी चमकाया जा रहा है। आज हमारे देश में 400 से अधिक न्यूज चैनल और 80, 000 के करीब अख़बार पंजीकृत हैं। मगर, अधिकतर न्यूज चैनलों में जो कुछ दिखाया जाता है उसका न्यूज से कोई लेना–देना नहीं होता। नाग–नागिन का नाच, भूत–प्रेत और भविष्यवाणी क्या यह सब न्यूज हैं ? कहीं कहीं तो संपादकों को भी कमीशन देने की बात सामने आती रही है।
अकूत संपत्ति और आधुनिक सुख सुविधाओं के चलते निजी स्तर पर पत्रकार प्राय: बिक ही जाते हैं। दरभंगा इसको भोग रहा है। वैसे अन्य जिलों की भी यही दुर्गति है लेकिन दरभंगा में हालिया जो बातें सामने आ रही है या यहां का कोकस जिस तरीके कार्य संस्कृति को अपना रहा है उससे पत्रकारिता की दुकान यहां चलने वाली नहीं बहुत जल्द या तो ऐसे पत्रकार उखाड़ फेंक दिए जाएंगें या फिर पूरी पत्रकारिता उसका जमात ही हाशिए पर चला जाएगा। पत्रकारिता का शटर डाउन हो जाएगा।





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