



सुना है एक बार फिर, चुनाव का मौसम लहलहा रहा है, निकल पड़े हैं सब दल बल सहित अपने अपने हथियारों के साथ शब्दबाणों का करके भयंकर वार करना चाहते हैं पूरी सेना को धराशायी भूलकर इस सत्य को चुनाव है भाई यहां साम दाम दंड भेद की नीतियां अपनाकर ही जीती जा सकती है लड़ाई। जी हां चुनावी माहौल गर्म है, बयानबाजियों का दौर भी तेज हो चला है, नेता रैली जोर पकड़ चुकी है और जनता की अदालत में नेताओं की अग्निपरीक्षा का वक्त आ गया है।
ऐसे चुनावी माहौल में जो कभी दरवाजे पर नहीं आया आज अचानक से घर पर पहुंच रहे। हाथ जोड़कर सलाम कर रहे आखिर सवाल जीत का है। यारो सच ही कहा है, राजनीति का रंग भी बड़ा अजीब होता है, वही दुश्मन बनता है जो सबसे करीब होता है, जिन्दा रहे चाहे जान जाएं, वोट उसी को दो जो काम आएं, बदल जाओ वक्त के साथ या फिर वक्त बदलना सीखो,मजबूरियों को मत कोसो हर हाल में चलना सीखो।





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