



हम यह नहीं सोचते कि घूमने कहां जाएंगें, हम तो यह सोचते है कि महीनें का आखिर कैसे बिताएंगे। एसी कार में घूमना तो ख्वाब से भी परे है, हम तो सोचते हैं कि कल रिक्शे वाले से दो रुपय कैसे कम कराएंगे। हम पिज्जा खाकर सौ रुपए टिप देने वालों में से नहीं, हम तो मीलो पैदल चलते है यह सोचकर, कि पैसे बचेंगे तो रात मे कुछ अच्छा पकाएंगे। किसी बड़ी सी रियासत का हिस्सा नहीं, इस बड़ी सी दुनिया का छोटा सा कोना चाहिए। आलीशान बंगले की तो कभी ख्वाहिश भी न थी, धरती की गोद और घास का बिछौना चाहिए। ‘ख्वाहिश’ शब्द का तो एहसास भी हमसे इतना दूर है जितना कि चांद धरती से, बस इतनी कोशिश है कि जरूरतों के पूरे होने का एहसास होना चाहिए। कभी सोचते हैं, हमारे बच्चे तो बैठे होंगे घर में तोहफे का ख्वाब सजाते हुए यह भ्रम भी टूट गया जब देखा उन्हे मिट्टी के खिलौने बनाते हुए। फिर याद आया कि बचपन हम गरीबों का कहां होता है, गरीबों का तो जीवन ही बीतता है अगले लम्हे को बेहतर बनाने की कोशिश मे हाथ बटाते हुए।
है कागज के टुकड़े गुरूर का सबब जिनके लिए, उन्हें हमसे मिला दो कुछ पल दो पल के लिए, वो भी समझ जाएंगे कि पैसे कमाने की तलब क्या होती है सिर्फ थोड़े से सुकून को जिंदगी में शामिल करने के लिए। गरीबों की औकात ना पूछो तो अच्छा है, इनकी कोई जात ना पूछो तो अच्छा है, चेहरे कई बेनकाब हो जाएंगे, ऐसी कोई बात ना पूछो तो अच्छा है। खिलौना समझ कर खेलते जो रिश्तों से, उनके निजी जज्बात ना पूछो तो अच्छा है, बाढ़ के पानी में बह गए छप्पर जिनके, कैसे गुजारी रात ना पूछो तो अच्छा है। भूख ने निचोड़ कर रख दिया है जिन्हें, उनके तो हालात ना पूछो तो अच्छा है, मज़बूरी में जिनकी लाज लगी दांव पर, क्या लाई सौगात ना पूछो तो अच्छा है। गरीबों की औकात ना पूछो तो अच्छा है, इनकी कोई जात ना पूछो तो अच्छा है। हालात यही है, जन्म तो काट लिया झूठी मुस्कुराहट के तले, अगले जन्म मे न कहना कि हम अपने कर्मो का हिसाब चुका रहे हैं। ऐसे में, बस एक बात का मतलब मुझे आज तक समझ नहीं आया, जो गरीब के हक के लिए लड़ते हैं वो अमीर कैसे बन जाते हैं।



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