



स्वास्थ्य की मंडी में दलालों की चांदी है। जो जितना बड़ा दलाल उसकी डॉक्टरों तक वैसी पहुंच। मरीज जाए भाड़ में डॉक्टरों को बस चाहिए डिटोल की हैंडवॉश चाहे क्लीनिक में मरीज आए ना आए कमीशन से पूरी कमाई तय है। ऐसे में हमारे शहर के हालात यह है, कुछ भी बदला नहीं फलाने ! सब जैसा का तैसा है, सब कुछ पूछो, यह मत पूछो आम आदमी कैसा है? क्या सचिवालय क्या न्यायालय, सबका वही रवैया है, बाबू बड़ा न भैय्या प्यारे, सबसे बड़ा रुपैया है, पब्लिक जैसे हरी फ़सल है, शासन भूखा भैंसा है। मंत्री केपीए का नक्शा, मंत्री से भी हाई है, बिना कमीशन काम न होता, उसकी यही कमाई है, रुक जाता है,कहकर फ़ौरन देखो भाई ऐसा है।
मन माफ़िक सुविधाएँ पाते हैं अपराधी जेलों में, काग़ज़ पर जेलों में रहते, खेल दिखाते मेलों में, जैसे रोज़ चढ़ावा चढ़ता, इन पर चढ़ता पैसा है। शहरी व्यवस्था ऐसी हो गई है कि डॉक्टरों की इंसानियत ताक पर है। मरीज हाशिए पर हैं। गरीबों की जमीन बिक रही डॉक्टरों के चक्कर में। ऐसे में, कोई चिल्ला चोंट के दम पर ऊंची कीमत लेता है, कोई कविता के मंदिर को ठेके पर दे देता है। आज कमीशन खेल हुआ है मंचों के बाजारों का, सूरज पर अधिकार हुआ है जुगनू का अंधियारों का। कोई देखो जोड़ तोड़ से लाल किला पा जाता है, एकलव्य का कटा अंगूठा याद हमें आ जाता है।



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