



गंदगी धेाने में थोड़ा हाथ मैला हो गया, पर, मेरा पानी से रिश्ता और गहरा हो गया। ये अंधेरा ही न होता तो बताओ फिर मुझे क्या पता चलता कि जीवन में सवेरा हो गया। दो मुलाक़ातें हुईं उससे मगर अब देखिए, अजनवी जो कल तलक था यार मेरा हो गया। इन परिंदों के लिए क्या आम, महुआ, नीम क्या मिल गया जो पेड़ उस पर ही बसेरा हो गया। वो किसी की पीर या दुख-दर्द आखिर क्या सुने, कान वाला होके जो इंसान बहरा हो गया।
जी हां, दरभंगा नगर निगम की हालत उसी बहरे की तरह है जो स्वच्छता के नाम पर शहर में जहर परोसने का जश्न मना रहा। शहर का प्रथम नागरिक दुर्व्यवहार की चिंता में तंग है तो पार्षदों के जेब इस बात के लिए खाली हो रहे कि फिर बहुत जल्द अविश्वास प्रस्ताव आने वाला है और फिर जेबें गरम होंगी। कुर्सी की हिफाजत में पैसे की ताकत फिर दिखेगी। हर वार्ड के पार्षद उसी वक्त के इंतजार में हैं और शहर का हाल यह, घर के अंदर भी कूड़े की बदबू जिंदा छोड़ने को तैयार नहीं। ऐसे में, बड़ी बड़ी बातें तो कर लीं, छोटी बात भुला दी है, किस प्रकार की अलमस्ती है, ये कैसी आज़ादी है।



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