



शहर का निजाम फिर से बदल गया। जो थी वो गईं जो आएं हैं फिर एक उम्मीद लेकर। फिर से वही सुधारक की भूमिका में मगर सवाल यही है हालात वहीं है, व्यवस्था वही है, अधिकारी वहीं हैं बस बदला है तो एक अदद कप्तान जो सवालों के घेरे में हैं आखिर प्रश्न उसी मोड़ पर अब भी खड़ा है जहां अनगितन सवाल चौराहों पर दरसअल की भूमिका में हैं कि, हर एक हत्या में, पक्ष किसका लेंगे, तय किया करते हैं उस समय जबकि हत्यारे को पहचान लेते हैं, वे हर जमाने में सफल व्यक्ति होते हैं, जो कि पक्ष लेने से पहले तय करते हैं, किसको हत्यारा बताने में लाभ है। यह उन्हें किसी समय तय करना पड़ता है सिर्फ देख लेते हैं कि कानून किस समय सबसे कमजोर है, उसी समय मिलकर चिल्लाते हैं चोर-चोर। ऐसे में, साहेब आप ही बताइए, कैसे मंज़र सामने आने लगे हैं, गाते-गाते लोग चिल्लाने लगे हैं। वैसे एक बात यह सौ फीसद सही है। वो थी तो माहौल कुछ और था आप आएं हैं तो माहौल बदला-बदला सा सहमा दिखता है कारण, मछलियों में खलबली है अब सफ़ीने उस तरफ़ जाने से क़तराने लगे हैं, कई फ़ाक़े बिता कर मर गया जो उसके बारे में वो सब कहते हैं अब, ऐसा नहीं,ऐसा हुआ होगा। पहले के हालात तो यह थे साहेब,यहां तो सिर्फ़ गूंगे और बहरे लोग बसते थे ख़ुदा जाने वहां पर किस तरह जलसा हुआ होगा। दादा दरवाजे पर बैठे यही सोच रहे, अपाहिज व्यथा को वहन कर रहा हूं, तुम्हारी कहन थी, कहन कर रहा हूं। ये दरवाज़ा खोलें तो खुलता नहीं है इसे तोड़ने का जतन कर रहा हूं…। दादा ने पड़ोसी से कहा देखो फिर से शहर का निजाम बदल गया है मगर हालात उसी शक्ल में सामने है जहां, रोने से किसी को पाया नहीं जाता, खोने से किसी को भुलाया नहीं जाता,वक़्त सबको मिलता है ज़िंदगी बदलने के लिए पर ज़िंदगी नहीं मिलती वक्त बदलने के लिए।





You must be logged in to post a comment.