



शिक्षक समाज की सर्वाधिक संवदेनशील इकाई है. शिक्षक अपना काम ठीक तरह से नहीं करते- यह आरोप तो सर्वत्र लगाया जाता है. लेकिन यह विचार कोई नहीं करता कि उसे पढ़ाने क्यों नहीं दिया जाता? आए दिन गैर-शैक्षिक कार्यों में इस्तेमाल करता प्रशासन, शिक्षकों की शैक्षिक सोच को, शैक्षिक कार्यक्रमों को पूरी तरह ध्वस्त कर देता है। बच्चों को पढ़ाना-सिखाना सरल नहीं होता और न ही बच्चे फाईल होते हैं. प्रशासनिक कार्यालय और अधिकारीगण शिक्षा और शिक्षकों की लगातार उपेक्षा करते हैं, उन्हें काम भी नहीं करने देते। इसी कारण स्कूली शिक्षा में अपेक्षित सुधार संभव नहीं हो पा रहा है।
हालात स्कूलों में यूं हो गए हैं कि मध्याह्न भोजन के नाम पर पूरा माल शिक्षक, स्कूल प्रबंधन व प्रधानाचार्य मिलकर गटक रहे हैं और बच्चे भूखे बिलबिलाते रहते हैं। सवाल यही, इंसानियत का दामन क्यों इतना छोटा हो गया हैं, क्या इंसान बनना इतना मुश्किल हो गया हैं। कीमत हर एक चीज की होती हैं, पर ज्ञान की कोई कीमत नही होती हैं। मंदिर में जाकर भगवान नही मिलता, बिना परिश्रम के ज्ञान नही मिलता। ऐसे में, मुझे पढ़ना-लिखना सिखाने के लिए धन्यवाद, मुझे सही-गलत की पहचान सिखाने के लिए धन्यवाद, मुझे बड़े सपने देखने और आकाश को चूमने का साहस देने के लिए धन्यवाद, मेरा मित्र, गुरु और प्रकाश बनने के लिए धन्यवाद, मेरा मध्याह्न भोजन गटक, चट कर लेने के लिए धन्यवाद मास्टर साहिब…।



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