




दरभंगा, देशज टाइम्स। अब बिजलियों का ख़ौफ़ भी दिल से निकल गया ख़ुद मेरा आशियां मिरी आहों से जल गया ज़िन्दगी के उलझे सवालों के जवाब ढूंढता हूं। कर सके जो दर्द कम, वोह नशा ढूंढता हूं।
वक़्त से मजबूर, हालात से लाचार हूं मैं जो दर्दे जीने का बहाना ऐसी राह ढूंढता हूं। बर्क़ ने मेरा नशेमन न जलाया हो कहीं सहन-ए-गुलशन में उजाला है ख़ुदा ख़ैर करे। न मह ने कौंद बिजली की न शोले का उजाला है। कुछ इस गोरे से मुखड़े का झमकड़ा ही निराला है।
वो मुखड़ा गुल सा और उस पर जो नारंजी दो-शाला है। रुख़-ए-ख़ुर्शीद ने गोया शफ़क़ से सर निकाला है। फेल बिजली हो गयी है रात मेरे ही भवन में आज आकर खो गयी है आ रही थीं वह लिए थाली मुझे भोजन खिलाने मैं उसी दम था झपटकर जा रहा रूमाल लाने देख पाया मैं न उनको. वह न मुझको देख पायीं रेलगाड़ी से लड़े दोनों, धरा पर हुए शायी पेट पर रसदार जलता शाक, पूरी पाँव पर थी आँख में चटनी गिरी जो चटपटेपन का निकर थी बाल पर सिरका गिरा जैसे ललित लोशन उड़ेला क्रीम भुर्ते का लगा मुखपर हुआ मेरा उजेला ले रहे हैं स्वाद सब अवयव, न रसना रसमयी है फेल बिजली हो गयी है।








You must be logged in to post a comment.