
दरभंगा, देशज टाइम्स। वर्दीवाले कहलाते हैं। जिनके कांधों पर भार रखा, जन जन की अभिलाषाओं का। जो धरती पर अपवाद बनें, मानव की परिभाषाओं का। मानव का जो तन रखकर भी निज अधिकारों से वंचित होते। जो तुम्हे सुरक्षित रखने को, खुद रात रात भर ना सोते।
जो सब की खुशियों की खातिर खुद की खुशियां सुलगाते हैं। वर्दी वाले कहलाते हैं, मगर हालात यही है, कुछ टूटे सपनों के टुकड़े, बुझे–बुझे कुम्हलाये मुखड़े, लाया हूं कुछ किस्से दुखड़े, पकड़,जकड़ लो मुंशी जी।
आमद कर लो मुंशी जी। शर्म इस बात की करो, लोग यही समझते हैं, आदर यही देते हैं, जब दुनिया जश्न मनाती है। तब खाकी फर्ज निभाती है। तन पर जब सब के रंग लगे।जब होली की हुड़दंग सजे। जब चारो ओर उमंग जगे। जब दुनिया फगुना जाती है, तब खाकी फर्ज निभाती है।
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