



सड़क पर ही ध्यान आता है कि मैं तुम्हें कुछ लिखना चाहता हूं क्या लिखूं सोच कर, किसी एक विषय पर ध्यान टिकाता हूं, जब तक मन की डायरी में लिखना शुरू करता हूं, कोई और विषय आकर सामने बिछ जाता है ये सारे विषय सड़क पर जैसे हर पल झरती ठण्ड की बारिश जैसे हैं, इसलिए लिखना छोड़ बैठता हूं, यह सोचता कि शायद मेरे न लिखने पर, धूप निकल आए, नहीं लिखता हूं, तो बची-खुची रोशनी, ग़ायब हो जाती है और ठंड का अंधेरा छाने लगता है सड़क पर चलता ही रहता हूं फ़ोन बजता ही रहता है, कोई है पुकारता हूं,
कोई है जो ख़बर ले कि अंधेरा छा रहा है कोई है पुकारता हूं, अब यह बात सरहदों के बीच की नहीं है धरती के हर छोर पर अंधेरा छा रहा है। सड़क पर फलवाली है, अगली बार मिलते ही जो शिकवा करेगी कि मैंने फल नहीं ख़रीदे सड़क पर नारियल पानी वाला है सड़क पर चिढ़ है जो धुँआ छोड़ती गाड़ियों की है सड़क पर सड़क है जिसे बच्चे की तरह देख सकता हूं बार-बार हम किसी सफर में नहीं हैं, कोई पहाड़ी, नदी या बाग नहीं हम शहर के बीच हैं। यूं सड़क पर फ़ोन पर अपने दिनों पर बातें करते हुए हम मान लेते हैं कि ज़िंदगी अभी भी जीने लायक है। मैं इसी सड़क पर उसे कहूंगा कि वह हत्यारों को पहचानने से कतराए नहीं और जब वह आए तो नाच भी ले तो मुझे क्या ग़लती से वह आ गया तो जो सच देखने से कतराते हैं वह उनके मुह पर दे मारेगा सच भरी कड़ाहियां। यही शहर है यही रोज का जाम है।



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